अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- नीलांबर, जिसका अर्थ है-1. नीला कपड़ा या वस्त्र 2. शनैश्चर; शनि ग्रह 3. बलदेव, जिसका वस्त्र नीला हो। प्रस्तुत है मैथिलीशरण गुप्त की कविता: मातृभूमि....
नीलांबर परिधान हरित तट पर सुन्दर है
सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥
नदियां प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं
बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की
हे मातृभूमि ! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥
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जिसके रज में लोट-लोट कर बड़े हुए हैं
घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुए हैं॥
परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये
जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाये॥
हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में
हे मातृभूमि ! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में?
पा कर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा
तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?
तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है
बस तेरे ही सुरस-सार से सनी हुई है॥
फिर अन्त समय तू ही इसे अचल देख अपनाएगी
हे मातृभूमि ! यह अन्त में तुझमें ही मिल जाएगी॥
निर्मल तेरा नीर अमृत के से उत्तम है
शीतल मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है॥
षट् ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है
हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है॥
शुचि-सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश है
हे मातृभूमि ! दिन में तरणि, करता तम का नाश है॥
सुरभित, सुन्दर, सुखद, सुमन तुझ पर खिलते हैं
भांति-भांति के सरस, सुधोपम फल मिलते हैं॥
औषधियां हैं प्राप्त एक से एक निराली
खानें शोभित कहीं धातु वर रत्नों वाली॥
जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं
हे मातृभूमि ! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं॥
क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है
सुधामयी, वात्सल्यमयी, तू प्रेममयी है॥
विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुःखहर्त्री है
भय निवारिणी, शान्तिकारिणी, सुखकर्त्री है॥
हे शरणदायिनी देवि, तू करती सब का त्राण है
हे मातृभूमि ! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है॥
जिस पृथ्वी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे
उससे हे भगवान ! कभी हम रहें न न्यारे॥
लोट-लोट कर वहीं हृदय को शान्त करेंगे
उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे॥
उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जायेंगे
होकर भव-बन्धन- मुक्त हम, आत्म रूप बन जायेंगे॥