उर्दू अदब में एक से एक बेहतरीन शायर हुए हैं, लेकिन नज़ीर अपना अलग स्थान रखते हैं। नज़ीर को सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल के तौर पर देखा जाता है। उन्होंने होली से लेकर लगभग सभी हिंदू-मुस्लिम त्योहारों पर अपनी कलम चलाई। नज़ीर के शायराने मिज़ाज पर होली का पूरा रंग चढ़ता था, उनकी कलम की स्याही होली के रंगों में मिल जाती थी, उन्होंने झूमकर लिखा-
जब फ़ागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारे होली की
ख़म शीशए जाम छलकते हों तब देख बहारे होली की
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारे होली की॥1॥
विज्ञापन
हो नाच रंगीली परियों का बैठे हों गुलरू रंग भरे
कुछ भीगी तानें होली की कुछ नाज़ो अदा के ढंग भरे
दिल भूले देख बहारों को और कानों में आहंग भरे
कुछ तबले खड़के रंग भरे कुछ ऐश के दम मुंहचुग भरे
कुछ घुंघरू ताल झनकते हों तब देख बहारे होली की॥2॥
सामान जहां तक होता है इस इश्रत के मतलूबों का
वह सब सामान मुहैया हो और बाग़ खिला हो खू़बों का
हर आन शराबें ढलती हों और ठठ हो रंग के डूबों का
इस ऐश मजे़ के आलम में एक ग़ोल खड़ा महबूबों का
कपड़ों पर रंग छिड़कते हों तब देख बहारे होली की॥3॥
गुलज़ार खिले हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो
कपड़ों पर रंग के छींटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो
मुंह लाल, गुलाबी आंखें हो और हाथों में पिचकारी हो
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारे होली की॥4॥
हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार
जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार।।
एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल
जिन्दगी की लज्जतें लाती हैं, होली की बहार।।
जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब
मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार।।
तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ
तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार।।
और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां
तो काफिर हो जिसे भाती है होली की बहार।।
नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम नजीर
फिर बरस दिन के उपर है होली की बहार।।
जब आई होली रंग भरी, सो नाज़ो अदा से मटकमटक
और घूंघट के पट खोल दिये, वह रूप दिखाया चमक-चमक
कुछ मुखड़ा करता दमक-दमक कुछ अबरन करता झलक-झलक
जब पांव रखा खु़शवक़्ती से तब पायल बाजी झनक-झनक
कुछ उछलें, सैनें नाज़ भरें, कुछ कूदें आहें थिरक-थिरक।।
यह रूप दिखाकर होली के, जब नैन रसीले टुक मटके
मंगवाये थाल गुलालों के, भर डाले रंगों से मटके
फिर स्वांग बहुत तैयार हुए, और ठाठ खु़शी के झुरमुटके
गुल शोर हुए ख़ुश हाली के, और नाचने गाने के खटके
मरदंगें बाजी, ताल बजे, कुछ खनक-खनक कुछ धनक-धनक।।