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Hindi Kavita: शंभुनाथ सिंह की रचना- जब-जब झोंपड़ियों की बस्ती बनती है सावन की रानी

काव्य डेस्क

Kavita
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                                                  पर्वत न हुआ, निर्झर न हुआ, 
सरिता न हुआ, सागर न हुआ, 
क़िस्मत ऐसी लेकर आया 
जंगल न हुआ, पांतर न हुआ। 

जब-जब नीले नभ के नीचे 
उजले ये सारस के जोड़े, 
जल बीच खड़े खुजलाते हैं 
पाँखें अपनी गर्दन मोड़े, 

तब-तब आकुल हो उठता मन, 
कितना अभिशप्त मिला जीवन! 
जलचर न हुआ, जलखर न हुआ, 
पुरइन न हुआ, पोखर न हुआ। 

जब-जब साखू बन में उठते 
करमा की धुन के हिलकोरे, 
मादल की थापों के सम पर 
भाँवर देते आँचल कोरे, 
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तब-तब पागल हो उठता मन 
किस अर्थ मिला ऐसा जीवन? 
पायल न हुआ, झाँझर न हुआ, 
गुदना न हुआ, काजर न हुआ। 

जब-जब झोंपड़ियों की बस्ती 
बनती है सावन की रानी, 
गदराए तन नर्तन करते 
बादल होता पानी-पानी, 

तब-तब सोचा करता है मन 
कितना असमर्थ हुआ जीवन? 
झूला न हुआ, झूमर न हुआ, 
कजरी न हुआ, चाँचर न हुआ। 

जब-जब आकर दस्तक देता 
कोई अनपहचाना गुंजन, 
प्राणों के बंद किवाड़ों की 
बजने लगती साँकल झन-झन, 

तब-तब पूछा करता है मन 
कितना अनमिल मेरा जीवन? 
बाहर जो था, भीतर न हुआ, 
भीतर जो था, बाहर न हुआ। 
2 वर्ष पहले
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