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Hindi Poetry: शैलेन्द्र के 2 चुनिंदा प्रेरक कविताएं

काव्य डेस्क

Kavita
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                                                  1-

आज मुझको मौत से भी डर नहीं लगता

राह कहती, देख तेरे पांव में कांटा न चुभ जाए
कहीं ठोकर न लग जाए;
चाह कहती, हाय अंतर की कली सुकुमार
बिन विकसे न कुम्हलाए;
मोह कहता, देख ये घरबार संगी और साथी
प्रियजनों का प्यार सब पीछे न छुट जाए!

किन्तु फिर कर्तव्य कहता ज़ोर से झकझोर
तन को और मन को,
चल, बढ़ा चल,
मोह कुछ, औ' ज़िन्दगी का प्यार है कुछ और!
इन रुपहली साजिशों में कर्मठों का मन नहीं ठगता!
आज मुझको मौत से भी डर नहीं लगता!

आह, कितने लोग मुर्दा चांदनी के
अधखुले दृग देख लुट जाते;
रात आंखों में गुज़रती,
और ये गुमराह प्रेमी वीर
ढलती रात के पहले न सो पाते!
जागता जब तरुण अरुण प्रभात
ये मुर्दे न उठ पाते!

शुभ्र दिन की धूप में चालाक शोषक गिद्ध
तन-मन नोच खा जाते!
समय कहता--
और ही कुछ और ये संसार होता
जागरण के गीत के संग लोक यदि जगता!
आज मुझको मौत से भी डर नहीं लगता!

2- 
 
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कवि तुम किनके? कविता किसकी?

जिनके सीने में सुइयों-सा गड़ता है दर्द विवशता का,
जिनके घर में घुस बैठा है अन्धा राक्षस परवशता का,
जो दुनिया भर का बोझ उठाए रंज-ओ-ग़म से लड़ते हैं,
जो अपनी राहें आप बना पर्वत की चोटी चढ़ते हैं,

                     कवि उनका है,
                     कविता उनकी !

जिनकी दो ख़ाली जेबें जब दुकान-हाट पर जाती हैं,
तो मोल-माल का देख दूर से आहें भर रह जाती हैं,
पर जिनके कड़ियल सीने में है राजों के राजों-सा दिल,
इस आसमान के नीचे ही जुड़ जाती हैं जिनकी महफ़िल...

                     कवि उनका है,
                     कविता उनकी !

जिनके सपनों की प्रीत परी बिक जाती है बाज़ारों में,
जिनके अरमानों की कलियाँ सो जाती हैं अंगारों में,
फिर भी जो दिल के घाव छुपा हँसते हैं ज़िन्दा रहते हैं...
तूफ़ाँ से काँधे क़दम मिला जो संग समय के बहते हैं...

                     कवि उनका है,
                     कविता उनकी !

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