देखा था जो तुझको
छिप कर कभी-कभी,
वो पल सता रहे हैं
मुझको अभी-अभी।
वो झील के किनारे
वो मस्त-मस्त नजारे
वो चांदनी रातें
हाथों में हाथ थामे
वो मीठी-मीठी बातें
वो यादों के लश्कर
मुझको बुला रहे हैं।
इन तनहाइयों और इन रातों में
इन रोते हुए जज़्बातों में
वो फिज़ा और वो नज़ारे
मुझको बुला रहे हैं।
कैसे बताऊं तुम बिन
कैसे जीवन बिता रहे हैं,
देखा था जो तुझको
छिप कर कभी-कभी,
वो पल सता रहे हैं
मुझको अभी अभी।
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