दीवारों से लटके
फ़िल्मी अभिनेता हैं
आँखें मिचकाती ट्रैफ़िक की लाइट है
ख़ुशबू की ‘सर सर’ में इठलाती चालें हैं
बहसीली मेज़ों पर धुएँ के छल्ले है
‘बस’ की मुड़ी टिकट खुँसी बेहद सुस्त घड़ी है
परकटी चीलों-से मँडराते पंखे हैं
उफ़, कितना शोर है।
कैसी दिव्य शांति है!
लेकिन इस सबके पार,
इस सबके पीछे,
रह-रह कर चौंकती,
घायल प्रतीक्षा है
पागल प्रतीक्षा है!
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