थोड़ा सा नदी का पानी, मुट्ठी भर रेत रख लो,
धान-गेहूं-सरसों वाले, हरे-हरे खेत रख लो।
रख लो एक बैल भईया, हल से बांध के,
दुअरे पर गाय खड़ी हो, चारा खाए सान के।
पूछेगा जो कोई तो उसको बताएंगे,
आने वाली पीढ़ियों को चल के दिखाएंगे,
कि दुनिया ऐसी हुआ करती थी।
स्कूल के पीछे वाला अमरुद का पेड़ रख लो,
पोखर के पीढ़ खड़ा वो खट्टे-मीठे बेर रख लो।
एक-दो बगिया रखलो, बगिया में फूल रे,
तितली और भौंरे जहां खेलें मिलजुल रे।
पूछेगा जो कोई तो उसको बताएंगे,
आने वाली पीढ़ियों को चल के दिखाएंगे,
कि दुनिया ऐसी हुआ करती थी।
माटी का चूल्हा रखलो, फूस की चुहानी रे,
मिट्टी के एक घड़े में ठंडा-ठंडा पानी रे।
बैठ के जमीन जहाँ हो खाने की छूट रे,
तावे से रोटी लेते गरम-गरम लूट रे।
दादी-नानी के खिस्से, बाबा की डांट रखना,
आंगन में लगने वाली बुढ़िया की खाट रखना।
सोफे तुम लाख लगा लो, बाबा की चौकी रखना,
उसपर एक पतला बिछौना, लोटा और पानी रखना।
रखना वही एक लालटेन, लालटेन में तेल रे,
रात करे जहाँ चाँदनी रौशनी से खेल रे।
पूछेगा जो कोई तो उसको बताएंगे,
आने वाली पीढ़ियों को चल के दिखाएंगे,
कि दुनिया ऐसी हुआ करती थी।
गाँव में एक मेला रखना, सर्कस और खेला रखना,
चाट और पकौड़ी वाले एक-दो ठेला रखना।
याद रखना झालमुड़ी का मर्चा तूफानी रे,
गुपचुप में पीने वाला इमली का पानी रे।
होली के रंग बचा लो, दिवाली के दीप रे,
भोर की अजानें रखना, छठ वाले गीत रे।
भूल नहीं जाना अपने लोक-व्यवहार रे,
पुरखों से मिले हुए सब तीज-त्यौहार रे।
पूछेगा जो कोई तो उसको बतायेंगे,
आने वाली पीढ़ियों को चल के दिखायेंगे,
कि दुनिया ऐसी हुआ करती थी।