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केदारनाथ अग्रवाल की कविता- जो शिलाएँ तोड़ते हैं

काव्य डेस्क

Kavita
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ज़िंदगी को
वह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं,
जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं।

यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के
श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!
ज़िंदगी को
वे गढ़ेंगे जो खदानें खोदते हैं,
लौह के सोए असुर को कर्म-रथ में जोतते हैं।

यज्ञ को इस शक्ति श्रम के
श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!
ज़िंदगी को
वे गढ़ेंगे जो प्रभंजन हाँकते हैं,
शूरवीरों के चरण से रक्त-रेखा आँकते हैं।

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यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के
श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!
ज़िंदगी को
वे गढ़ेंगे जो प्रलय को रोकते हैं,
रक्त से रंजित धरा पर शांति का पथ खोजते हैं।

यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के
श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!
मैं नया इंसान हूँ इस यज्ञ में सहयोग दूँगा।
ख़ूबसूरत ज़िंदगी की नौजवानी भोग लूँगा।
3 वर्ष पहले
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