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भैरवी का टूट गया है बांध: लता मंगेशकर के निधन पर श्रद्धांजलि स्वरूप एक मार्मिक कविता

काव्य डेस्क

Kavita
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अशोक के इस बाग में, 
किसने फैलाया शोक?
तने को ही चुभ रही है, 
तेज पंखुड़ियों की नोक!

तुम्हारा जाना सामान्य नहीं,  
खुशी के युग का है अंत!
संवाद भी हो रहा असहनीय,  
मन भी अंदर से है आक्रांत!

मंगेश के मंदिर में,
शांत हो गया ओंकार!
घंटी के बजाने पर भी,
देखो नहीं है कोई शोर!

कौन किसे सांत्वना दें,  
तुम ही मुझे बताओ?
आंसुओं में छिप गया है, 
जैसे हर तरह का घाव!

कोई भी भाव ऐसा नहीं, 
जो कंठ से न कराया दर्ज!
हर तरह के गाने से चढ़ाया
पीढ़ियों पर सप्तसुरी कर्ज!

दुस्साहस से "लता" शब्द  
को अगर दिया उलट!
वो भी हो "ताल" बनकर 
बन जाता है संगीत! 

भैरवी का टूट गया है बांध,
हर आंख में भरा पानी है!
विक्षिप्त से सातों सुरों को, 
है अपनी दीदी को तलाश! 

दीनानाथ को स्वर्ग में  
है बेटी का इंतजार!
वह भी संतोष से चलीं,
आलौकिक सुरों के साथ! 

आज क्षितिज पर भी,
उगा नहीं है कोई सूरज!
दसों दिशाएं भी देखों,
अंधेरे में गई है डूब

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मूल मराठी कविता

अशोकाच्या वाटेवर,
कुणी पसरला शोक?
टोचे देठानाच आता,
पाकळ्यांचे तीक्ष्ण टोक!

तुझे जाणे ना सामान्य,
आनंदाचा हा युगांत!
संवादिनीला असह्य,
तिच्या भात्याचा आकांत!

मंगेशाच्या मंदिरात,
देई हुंदका ओंकार!
घंटा बडवूनसुद्धा,
तिचा गोठला झंकार!

कुणी कुणाचे सांत्वन,
आता करायाचे सांग?
आसवांच्या पाठीमागे,
उभी हुंदक्यांची रांग!

कोणताही भाव नाही,
तुझ्या गाण्यातून वर्ज!
पिढ्यापिढ्याना हवेसे,
तुझे सप्तसुरी कर्ज!

दुस्वासाने "लता" शब्द,
उलटाही केला तरी!
तोही "ताल होतो आणि,
येई संगिताच्या घरी!

भैरवीचा फुटे बांध,
हमसून रडे नांदी!
साती स्वर वेडेपिसे,
शोधतात त्यांची दिदी!

मंगेशीच्या गाभाऱ्यात,
ज्योत स्फुंदे समईत!
अभिषेकही तुटक,
धार विसरली रीत!

वाट पाही दिनानाथ,
त्यांच्या लेकीची स्वर्गात!
तीही चालली तृप्तीत,
अलौकिक स्वर गात!

आज क्षितिजावरती,
सूर्य उगवला नाही!
गेल्या तमात बुडून,
आंधळ्याच दिशा दाही!

कवि: प्रमोद जोशी
अनुवाद: रवींद्र भजनी
4 वर्ष पहले
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