विज्ञापन

Urdu Poetry: फ़ना बुलंदशहरी की ग़ज़ल 'आप बैठे हैं बालीं पे मेरी मौत का ज़ोर चलता नहीं है'

काव्य डेस्क

Kavita
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            


आप बैठे हैं बालीं पे मेरी मौत का ज़ोर चलता नहीं है
मौत मुझ को गवारा है लेकिन क्या करूँ दम निकलता नहीं है

ये अदा ये नज़ाकत भरा सिन मेरा दिल तुम पे क़ुर्बान लेकिन


क्या सँभालोगे तुम मेरे दिल को जब ये आँचल सँभलता नहीं है

मेरे नालों की सुन कर ज़बानें हो गई मोम कितनी चटानें


मैं ने पिघला दिया पत्थरों को इक तेरा दिल पिघलता नहीं है

शैख़ जी की नसीहत भी अच्छी बात वाइज़ की भी ख़ूब लेकिन


जब भी छाती हैं काली घटाएँ बिन पिए काम चलता नहीं है

देख ले मेरी मय्यत का मंज़र लोग कांधा बदलते चले हैं


एक तेरी भी डोली चली है कोई कांधा बदलता नहीं है

मय-कदे के सभी पीने वाले लड़खड़ा कर सँभलते हैं लेकिन


तेरी नज़रों का जो जाम पी ले उम्र-भर वो सँभलता नहीं है

2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Pankaj Sharma

1223 कविताएं

View Profile