मैं आकाश में इतने ऊपर कभी नहीं उड़ा
कि स्त्री दिखाई ही न दे
इसलिए मैं उन लोगों के बारे मैं कुछ नहीं जानता
कि वे किस तरह सोचते हैं जो ईश्वर के साथ रहते हैं
वैसे मेरी आत्मा आकाश में बहुत ऊंचे तक उड़ी है
पर डोर हमेशा किसी स्त्री के हाथ में रही
और सब जानते हैं कि स्त्री ज़्यादा ढील नहीं देती
प्रेम करती हुई औरत के बाद भी अगर कोई दुनिया है
तो उस वक़्त वह मेरी नहीं है
उस इलाक़े में मैं साँस तक नहीं ले सकता
जिसमें औरतों की गंध वर्जित है
सचमुच मैं भाग जाता चंद्रमा से फूल और कविता से
नहीं सोचता कभी कोई भी बात ज़ुल्म और ज़्यादती के बारे में
अगर नहीं होती प्रेम करने वाली औरतें इस पृथ्वी पर
स्त्री के साथ और उसके भीतर रहकर ही मैंने अपने को पहचाना है
उस अपने को जो हड्डियों और मांस के परे रहता है
और फिर भी शाकाहारी नहीं है
और जब वह मेरे लिए अंधड़ की तरह बिफरती है
तभी मुझे यक़ीन आता है कि मेरे भीतर जलती लौ बुझ नहीं सकती
क्योंकि औरत आग पर सिर्फ़ रोटियाँ ही नहीं सेंकती
ख़ुद आग की हिरनी की तरह चौकड़ी भी भरती है
औरत का आग से रिश्ता बेबात नहीं होता
स्त्री के साथ और उसके भीतर रहकर ही मैंने अपने को पहचाना है
उस अपने को जो हड्डियों और मांस के परे रहता है
और फिर भी शाकाहारी नहीं है
और जब वह मेरे लिए अंधड़ की तरह बिफरती है
तभी मुझे यक़ीन आता है कि मेरे भीतर जलती लौ बुझ नहीं सकती
क्योंकि औरत आग पर सिर्फ़ रोटियाँ ही नहीं सेंकती
ख़ुद आग की हिरनी की तरह चौकड़ी भी भरती है
औरत का आग से रिश्ता बेबात नहीं होता
पारस पत्थर और कल्पवृक्ष के बारे में मैं कुछ नहीं जानता
मेरी आत्मा झाग के थपेड़ों में नहा नहीं रही है
मुझे औरत की अँगुलियों के बारे में पता है
ये अंगुलियाँ समुद्र की लहरों से निकलकर आती हैं
और एक थके-माँदे पस्त आदमी को
हरे-भरे गाते दरख़्त में बदल देती हैं
जिसे तुम त्वचा कहते हो वह नदी का वसंत है
चाँदनी में बहता हुआ इच्छाओं का झरना
उसे समय को परे धकेल कर
जगह को गहराइयों में ले जाना ख़ूब आता है
फिर भी सिर्फ़ एक औरत को समझने के लिए
हज़ार साल की ज़िंदगी चाहिए मुझको
क्योंकि औरत सिर्फ़ भाप या वसंत ही नहीं है
एक सिंफनी भी है समूचे ब्रह्मांड की
जिसका दूध दूब पर दौड़ते हुए बच्चों में
ख़रगोश की तरह कुलाँचे भरता है
और एक कंदरा भी है किसी अज्ञात इलाक़े में
जिसमें उसकी शोकमग्न परछाई
दर्पण पर छाई गर्द को रगड़ती रहती है।