आकस्मिक मुलाकात - विस्लावा शिम्बोर्स्का
हम मिले बड़े सलीके और शिष्टाचार के साथ
हमने कहा- कितनी खुशी हुई आपको इतने सालों बाद देखकर
पर हमारे भीतर थककर सो गया था बहुत-कुछ
घास खा रहा था शेर, बाज ने अपनी उड़ान छोड़ दी थी
मछलियाँ डूब गई थीं और भेड़िए पिंजरों में बन्द थे
हमारे साँप अपनी केंचुल बदल चुके थे
मोरों के पंख झड़ गए थे
उल्लू तक नहीं उड़ते थे हमारी रातों में
हमारे वाक्य टूट कर ख़ामोश हो गए
असहाय-सी मुस्कान में खो गई
हमारी इंसानियत
जो नहीं जानती कि आगे क्या कहे
'जब तुम बूढ़ी हो जाओगी' - विलियम बट्लर येट्स
जब तुम बूढ़ी, पके बालों वाली और नींद से बोझिल होगी
और आग के समीप बैठ कर ऊंघोगी, इस क़िताब को उठा लेना
और धीरे से पढ़ना, उस सौम्य नज़र के बारे में सोचना
जो तुम्हारी आंखों में कभी थी और उनकी गहरी झलक के बारे में सोचना
कितने ही लोगों ने प्रेम किया तुम्हारे ख़ुशनुमा अनुग्रह के क्षणों को
और झूठे या सच्चे प्रेम से चाहा तुम्हारी सुन्दरता को
लेकिन एक आदमी प्यार करता था तुम्हारी पावन आत्मा को
और तुम्हारे बदलते चेहरे के दुखों को
और गर्म छड़ों की बगल में नीचे झुकते हुए
दुख से बड़बड़ाना, प्यार कैसे उड़ गया
और चढ़ गया ऊपर पहाड़ों पर
और छिपा दिया अपना चेहरा तारों की भीड़ में
मूल अंग्रेज़ी से सरिता शर्मा द्वारा अनूदित
एक कवि से मैंने एक बार कहा,
"तुम्हारी मौत से पहले हम तुम्हारे शब्दों का मूल्य नहीं जान पाएंगे"
उसने कहा, "ठीक कहते हो।
रहस्यों पर से परदा मौत ही उठा पाती है।
और अगर वास्तव में तुम मेरे बारे में जानना चाहते हो तो सुनो,
जितना बोल चुका हूं उससे ज्यादा कविता मेरे हृदय में हैं
और जितना लिख चुका हूं
उससे कहीं ज्यादा मेरे खयालों में है।"
सब ख़त्म हो गया / अलेक्ज़ेंडर पुश्किन
सब ख़त्म हो गया अब हममें कोई सम्बन्ध नहीं है
हम दोनों के बीच प्रेम का अब कोई बन्ध नहीं है
अन्तिम बार तुझे बाहों में लेकर मैंने गाए गीत
तेरी बातें सुनकर लगा ऐसा, ज्यों सुना उदास संगीत।
अब ख़ुद को न दूंगा धोखा, यह तय कर लिया मैंने
डूब वियोग में न करूंगा पीछे, तय कर लिया मैंने
गुज़र गया जो भूल जाऊंगा, तय कर लिया है मैंने
पर तुझे न भूल पाऊंगा, यह तय किया समय ने
शायद प्रेम अभी मेरा चुका नहीं है, ख़त्म नहीं हुआ है
सुन्दर है, आत्मीय है तू, प्रिया मेरी अभी बहुत युवा है
अभी इस जीवन में तुझ से न जाने कितने प्रेम करेंगे
जाने कितने अभी मर मिटेंगे और तुझे देख आहें भरेंगे।
'क्या भूल गए तुम' - क्रिस्टीना रोजेटी
क्या भूल गए तुम कि कैसे गर्मी की उस रात में,
टहल रहे थे हम दोनों ले चांदनी को साथ में,
जबकि हवा के गर्म झोंके हमें सुना रहे थे लोरियां?
क्या भूल गए तुम कि कैसे सराहा था
तुमने अंधेरे और रोशनी को
हां घबरा नहीं रहे थे पर नहीं थे बहुत सहज भी?
और कैसे कहा था तुमने कि चांद की चमक की जगह
भा रही है सितारों की टिमटिमाती रोशनी
पर बहुत जल्द ही तुम शर्माए
और तुम्हारी बातों पर घूम गयी संदेह की सुई,
हम टहलते रहे थे बेपरवाह समय की सीमाओं से,
जब तक न चेताया हमें सुदूर चर्च की पहली घंटी की धुन ने,
हम मुड़े एकदम से और पहुँच गए हवा के परों पर होकर सवार,
घंटी की दूसरी धुन से ही पहले,
मगर क्या, क्या वाकई उन लम्हों को तुम गए हो भूल?
ओह, फिर मैं ही कैसे संजो सकी उन क्षणों की धूल?
मूल अंग्रेज़ी से अनुवाद : सोनाली मिश्र
5 वर्ष पहले