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सावन: मैली, हाथ की धुली खादी-सा है आसमान

काव्य डेस्क

Irshaad
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                            -शमशेर बहादुर सिंह- 
        
                                                    
                            

मैली, हाथ की धुली खादी-
सा है
आसमान।
जो बादल का पर्दा है वह मटियाला धुंधला-धुंधला
एक-सार फैला है लगभग :
कहीं-कहीं तो जैसे हलका नील दिया हो।
उसकी हलकी-हलकी नीली झांइयां
मिटती बनती बहती चलती हैं।
उस धूमिल अंगनारे के पीछे,
वह मौन गुलाबी झलक
एकाएक उभरकर ठहरी, फिर मद्धिम होकर मिट गयी 
जैसे घोल गया हो कोई गंदले जल में
अपने हलकी- मेंहदीवाले हाथ।

मैली मटियाली मिट्टी की चाक
भीगी है पूरब में
...सारे आसमान में।
नीली छाया उसकी चमक रही है
जैसे गीली रेत
(यह जोलाई की पंद्रह तारीख है
बादल का है राज)
-या जैसे, उस फाख्ताम के बाजू के अंदर का रोआं
कोमल उजला नीला
(कितना स्वच्छ !)
जिसको उस शाम
हमने मारा था !

ये नीले होंठ
जो शाम का पूरब हैं आज
क्याा कहते हैं?
सावन की पलकें क्यों 
भारी होती जाती है? यह मौन
टंकार
जो क्षितिज-भौंह में कांपती-सी है
दहला दहला देती मेरा हृदय।
वह
मोतियों की लूट...कहां गयी वह हंसी?
जहां जमीन और आसमान मिल रहे हैं
वह भौंह
कांप रही है।
सावन आया है:
खूब समझता हूं मैं
सावन की ये पलकें
मूंद रही हैं मुझको।

देखो, रात
बिछलन से भरी हुई है
(तारे जुगनू होने चले गये हैं
चांद, चांद-सा दिल में है, बस 
दिल, कि बहकती हुई रात है...)
यह रात फिसलन से भरी हुई है।

हां,
शर्माओ न मानी में!
तुम लफ्ज नहीं हो; न
कठिन अर्थ हो कोई!
तुम छंद की लय भी हो अगर,
पर्दा हो (मान लिया!)
तुम
गीत खुले हुए हो, वही
जो मैंने
कल रात को गलियों में
गाया था
(...काली उन कीचड़ से भरी हुई, तनहा गलियों में!)
शर्माओ न धड़कन की तरह
दिल में! तुम तो
धड़कन का इलाज हो!
तुम तो हो महज अता-पता मेरा!
अरे
वह नाम कहां हो
जो बूझ लिये जाओ! शर्माओ मत।

ओ शौक के परवानो
जरा ठहरो 
यह शमां नहीं है।
यह दाग हैं सिर्फ 
यादों की शाम है
मेरे चिलमन में...
जरा ठहरो।

सावन है कि फानूस
इक बूंद लहू का? ओ
शौक के परवानो,
यहां आग नहीं है, तरी है।
जरा ठहरो।

सावन की घटा है
हिलता हुआ फानूस आकाश।
तुम कहां हो? ये घटा...
नाच रही है!

यह आसमान
चूम रहा है मेरी चौखट।
मैं चांद और सूरज को निकालूं
आल्माारी में रखे हुए एलबम से।
-तुम आओ न!
तुम कहां हो? ये घटा...!

परवानो,
तुम पर यहीं रख जाओ
औ रेंग जाओ
ताकि सनद रहे और
वक्त पे काम...
ये घटा ...नाच रही है।
तुम कहां हो?
मैं खुद तो नही
ये खामोश
सुलगता हुआ पहरा-
ये फानूस?
तुम कहां हो?...यह घटा नाच रही है।

तुम एक सवाल हो
मामूली- सा आज 
यह सावन
क्यों व आया है?
यह सावन क्यों आया है?
तुम एक सवाल की हद हो,
तुम एक सवाल की हद हो
मेरे लिए,
मेरे लिए -
यह सावन
क्यों छाया?
- - यह सावन
मेरी उमीदों की सांझ पर
आज क्यों छाया?
यह एक संदेश
झलका जो -
कहां से?
तुम वह हो।
आज मेरे लिए तुम
उसकी हद हो।
उस बात की हद हो
जो मेरे लिए हो- तुम
वह मेरी
हद हो
तुम,
तुम मेरे लिए
मेरी हद हो मेरी हद हो
तुम
मेरे
लिए...

साभार: कविता कोश 
9 वर्ष पहले
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