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देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से, चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से 

काव्य डेस्क

Irshaad
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                            -साहिर लुधियानवी-
        
                                                    
                            

देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से 
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से 

ऐ रूह-ए-अस्र [1] जाग कहां सो रही है तू 
आवाज़ दे रहे हैं पयम्बर[2] सलीब[3] से 

इस रेंगती हयात[4] का कब तक उठाएं बार 
बीमार अब उलझने लगे हैं तबीब [5] से 

हर गाम[6] पर है मजमा-ए-उश्शाक़[7] मुंतज़िर [8]
मक़्तल [9] की राह मिलती है कू-ए-हबीब [10]से 

इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ 
जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब [11] से 

1. समकालीन समय की आत्मा 2. संदेशवाहक 3. क्रॉस, कमज़ोर 4.जीवन 5. डॉक्टर 6.क़दम 7.प्रेमियों की भीड़ 8.इंतिज़ार करनेवाला 9.हत्या की जगह 10.दोस्त की गली 11.प्रतिद्वंद्वी, प्रतिस्पर्धी

(साभार- रेख़्ता)
9 वर्ष पहले
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