विज्ञापन

पिता के प्रेम में भीगे ग़ज़लकार आलोक श्रीवास्तव के अल्फ़ाज़, दो प्रतिनिधि ग़ज़लें  

रत्नेश मिश्र

Irshaad
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  धड़कते साँस लेते रुकते चलते मैंने देखा है 
कोई तो है जिसे अपने में पलते मैंने देखा है 

तुम्हारे ख़ून से मेरी रगों में ख़्वाब रौशन है 
तुम्हारी आदतों में ख़ुद को ढलते मैंने देखा है 

न जाने कौन है जो ख़्वाब में आवाज़ देता है 
ख़ुद अपने-आप को नींदों में चलते मैंने देखा है 
विज्ञापन

मेरी ख़ामोशियों में तैरती हैं तेरी आवाज़ें 
तिरे सीने में अपना दिल मचलते मैंने देखा है 

बदल जाएगा सब कुछ बादलों से धूप चटख़ेगी 
बुझी आँखों में कोई ख़्वाब जलते मैंने देखा है 

मुझे मालूम है उन की दुआएँ साथ चलती हैं 
सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते मैंने देखा है 

घर की बुनियादें दीवारें बामो-दर थे बाबू जी 

घर की बुनियादें दीवारें बामो-दर थे बाबू जी 
सबको बांधे रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबूजी 

तीन मुहल्लों में उन जैसी कद काठी का कोई न था 
अच्छे ख़ासे ऊंचे पूरे क़द्दावर थे बाबू जी 

अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है 
अम्मा जी की सारी सजधज सब ज़ेवर थे बाबू जी

भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता 
अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी 

कभी बड़ा सा हाथ खर्च थे कभी हथेली की सूजन 
मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी 
7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Rajiv Tyagi

423 कविताएं

View Profile

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile

Sanjay Nirala

42 कविताएं

View Profile

RATAN KUMAR

616 कविताएं

View Profile