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गोपालदास नीरज: निर्माण घृणा से नहीं प्यार से होता है साथी !

काव्य डेस्क

Irshaad
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                                                  यह नफरत की बारूद न बिखराओ साथी !
यह युद्धों का ज़हरीला नारा बंद करो 
जो प्यार तिजोरी सेफ़ों में है तड़प रहा 
उसके बंधन खोलो, उसको स्वच्छंद करो !

मृत मानवता जिंदगी मांगती है तुमसे
दो बूंद स्नेह की उसके प्राणों में ढालो
आदम का यह जो स्वर्ग हो रहा मरघट 
जाओ ममता का एक दिया उसमें बालो!
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निर्माण घृणा से नहीं प्यार से होता है 
सुख-शांति खड्ग पर नहीं फूल पर चलते हैं,
आदमी देह से नहीं नेह से जीता है  
बम्बों से नहीं वज्र से बोल पिघलते हैं 

तुम डरो न, आगे आओ निज भुज फैलाओ
है प्यार जहां, तलवार वहां झुक जाती है
पतवार प्रेम की छू जाए जिस किश्ती को 
मझधार पार उसको खुद पहुंचा आती है 

जिसके अधरों पर गीत प्रेम का जीवित है 

जिसके अधरों पर गीत प्रेम का जीवित है 
वह हंस कर तूफानों को गोद खिलाता है 
जिसके सीने में दर्द छुपा है दुनिया का
सैलाबों से बढ़कर वह हाथ मिलाता है 

कितना ही क्यों न बड़ा हो घाव हृदय में, पर
सच कहता हूं यह प्यार उसे भर सकता है,
कैसा ही बाग़ी-दुश्मन हो आदमी मगर
बस एक अंश्रु का तार क़ैद कर सकता है 

कितना ही उबड़-खाबड़ हो रास्ता किन्तु

कितना ही उबड़-खाबड़ हो रास्ता किन्तु
वह प्यार फूल सा तुम्हें उठा ले जायेगा 
कैसी ही भीषण अंधियारी हो धुआं-धुंध 
पर एक स्नेह का दीप सुबह ले आएगा 

मैं इसीलिए अक्सर लोगों से कहता हूं 
जिस जगह बंटे नफ़रत जा प्यार चुराओ तुम
जो चोट करे तुम पर उसके चूम लो हाथ 
जो गाली दे उसको आशीष पिन्हाओ तुम 

तुम शांति नहीं ला पाए युद्धों के द्वारा 

तुम शांति नहीं ला पाए युद्धों के द्वारा 
अब फेंक ज़रा तलवार, प्यार लेकर देखो 
सच मानो निश्चय विजय तुम्हारी ही होगी 
दुश्मन को अपना हृदय ज़रा देकर देखो 

साभार : हमारे लोकप्रिय गीतकार- गोपालदास 'नीरज', संपादक- शेरजंग गर्ग (वाणी प्रकाशन) 
8 वर्ष पहले
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