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सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए - अटल बिहारी वाजपेयी

दीपाली अग्रवाल

Irshaad
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भारत के दिवंगत भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार संसद के सत्र में कहा था कि - "सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए।" चूंकि देश सर्वोपरि है और एक राजनेता को अव्व्ल अपने देश के लिए पूरी निष्ठा से काम करना चाहिए। अटल बिहारी वाजपेयी एक नेता तो थे ही साथ ही कविताएं भी लिखा करते थे। उन्होंने देश के लिए भी कविताएं लिखीं।


भारत जमीन का टुकड़ा नहीं
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है
हिमालय मस्तक है
कश्मीर किरीट है
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं
कन्याकुमारी इसके चरण हैं
सागर इसके पग पखारता है
यह चन्दन की भूमि है
अभिनन्दन की भूमि है
यह तर्पण की भूमि है
यह अर्पण की भूमि है

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दुनिया का इतिहास पूछता

दुनिया का इतिहास पूछता
रोम कहाँ, यूनान कहाँ?
घर-घर में शुभ अग्नि जलाता
वह उन्नत ईरान कहाँ है?
दीप बुझे पश्चिमी गगन के
व्याप्त हुआ बर्बर अंधियारा
किन्तु चीर कर तम की छाती
चमका हिन्दुस्तान हमारा
शत-शत आघातों को सहकर
जीवित हिन्दुस्तान हमारा
जग के मस्तक पर रोली सा
शोभित हिन्दुस्तान हमारा

एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, 
पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।

अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतन्त्रता, 
अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता। 
त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतन्त्रता, 
दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता।

इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो,
चिनगारी का खेल बुरा होता है । 
औरों के घर आग लगाने का जो सपना, 
वो अपने ही घर में सदा खरा होता है।

अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो, 
अपने पैरों आप कुल्हाडी नहीं चलाओ। 
ओ नादान पडोसी अपनी आँखे खोलो, 
आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ।

पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है? 
तुम्हे मुफ़्त में मिली न कीमत गयी चुकाई। 
अंग्रेजों के बल पर दो टुकडे पाये हैं, 
माँ को खंडित करते तुमको लाज ना आई?

अमरीकी शस्त्रों से अपनी आजादी को 
दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो। 
दस बीस अरब डालर लेकर आने वाली बरबादी से 
तुम बच लोगे यह मत समझो।

धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से 
कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो।
हमलो से, अत्याचारों से, संहारों से 
भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो।

जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार, 
अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष,
स्वातन्त्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे 
अगणित जीवन यौवन अशेष।

अमरीका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध,
काश्मीर पर भारत का सर नही झुकेगा 
एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते,
पर स्वतन्त्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा ।

7 वर्ष पहले
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