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विश्व हास्य दिवस: चुनाव और पत्रकार पर काका हाथरसी की 2 चुनिंदा कविताएं

काव्य डेस्क

Hasya
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                                                  हार गए वे, लग गई इलेक्शन में चोट।
अपना अपना भाग्य है, वोटर का क्या खोट?
वोटर का क्या खोट, ज़मानत ज़ब्त हो गई।
उस दिन से ही लालाजी को ख़ब्त हो गई॥
कह ‘काका’ कवि, बर्राते हैं सोते सोते।
रोज़ रात को लें, हिचकियाँ रोते रोते॥
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पत्रकार दादा बने, देखो उनके ठाठ।
काग़ज़ का कोटा झपट, करें एक के आठ॥
करे एक के आठ, चल रही आपाधापी।
दस हज़ार बतलाय, छपें ढाई सौ कापी॥
विज्ञापन दे दो तो, जय-जयकार कराए।
मना करो तो उल्टी-सीधी न्यूज़ छपाए॥

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5 महीने पहले
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