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माणिक वर्मा की हास्य कविता: रात के बारह बजे

काव्य डेस्क

Hasya
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                                                  रूप की जब की बड़ाई, रात के बारह बजे 
शेरनी घेरे में आई, रात के बारह बजे 

कल जिसे दी थी विदाई, रात के बारह बजे 
वो बला फिर लौट आई, रात के बारह बजे 

हम तो अपने घर में बैठे तक रहे थे चांद को 
और चांदनी क्यों छत पे आई, रात के बारह बजे 
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देखने को दिन में ही मनहूस चेहरे कम न थे 
तूने क्यूं सूरत दिखाई, रात के बारह बजे 

चोरियां करने को निकलीं जब पुलिस की टोलियां 
चोर ने सिटी बजाई, रात के बारह बजे 

मैं तो दिन के 10 बजे पैदा हुआ था भाइयों 
दे रहे हो तुम बधाई, रात के बारह बजे

घर के मंदिर का भी पुराना शंख बजने लगा 
उसने जब घंटी बजाई, रात के बारह बजे 

ये बड़े लोगों की महफिल है यहां मत पूछना 
कौन है किसकी लुगाई, रात के बारह बजे 

कैसे मंदिर के बगल में रहती दारू की दुकान 
पी के भक्तों ने हटाई, रात के बारह बजे

मल्लिका को देखकर बाबा ने खुश होकर कहा 
योग क्रिया रंग लाई, रात के बारह बजे 

जाने कब आतंकवादी मार दें गोली मुझे 
इसलिए लुंगी सिलाई, रात के बारह बजे 

बज गये जनता के बारह धन्य हो बापू तुम्हें 
ख़ूब आजादी दिलाई, रात के बारह बजे 

तब हुआ एहसास मुझको हो गई बेटी जवान 
कंकरी जब घर पे आई, रात के बारह बजे 

6 महीने पहले
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