रस्ता है मुश्किल
ख़स्ता है हाल भइया
झंझट ही झंझट, दैया री दैया।
देखा मैंने एक आदमी
पड़ा सड़क के बीच में
खाई चोट कराह रहा था
सना हुआ था कीच में
जाने क्या झंझट हो भइया
जाने कैसा लफड़ा हो
खिसक लिया अनदेखी करके
बना इस घड़ी नीच मैं
राम जाने क्या पूछे सिपइया
रस्ता है मुश्किल
ख़स्ता है हाल भइया
झंझट ही झंझट, दैया री दैया
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एक दिवस की बात बताता
बिना किसी संकोच के
गुंडा छेड़ रहा लड़की को,
दोनों हाथ दबोच के
मदद करो वो लड़की बोली
पर न कोई आगे आया
मैं भी अपने घर भागा
मन में इतना सोच के
ये ज़माना बड़ा ही निरदइया।
रस्ता है मुश्किल
ख़स्ता है हाल भइया
झंझट ही झंझट, दैया री दैया
लाठी ले कुछ लोग झोंपड़ी
जला रहे थे जान के
हमने देखा, पर हम घर में
सोए लंबी तान के
क्यों रोके जी,
अपना घर तो ठीक है
बहुत बड़ा है मुलक हमारा
अपने हिंदुस्तान के
हम अकेले नहीं हैं खिवइया ?
रस्ता है मुश्किल
ख़स्ता है हाल भइया
झंझट ही झंझट, दैया री दैया
जो भी किए फैसले भइया
क्या वो बिल्कुल ठीक थे
आंखों देखे जोर जुलम में
क्या ख़ुद नहीं शरीक थे ?
रखकर दिल पर हाथ बताना
देख जुलम मुंह मोड़ा क्यों
हाथ पकड़ना था जालिम का
जब इतना नज़दीक थे
आप खुद भी बने थे कसइया
रस्ता है मुश्किल
ख़स्ता है हाल भइया
झंझट ही झंझट, दैया री दैया
भीतर के डर को
भगा देना भइया
काहे का झंझट, काहे की दैया ?
~अशोक चक्रधर
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