गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर अमर उजाला काव्य की ओर से आयोजित ' इस मिट्टी के नाम एक शाम' कार्यक्रम में कवियों की उपस्थिति से गूंज उठी महफ़िल। ऑनलाइन कवि सम्मेलन का लाइव प्रसारण अमर उजाला के फेसबुक पेज और यू-ट्यूब चैनल से शाम 6 बजे किया गया। गणतंत्र दिवस के ख़ास अवसर पर काव्य की यह महफ़िल देशभक्ति के गीतों और रचनाओं से सराबोर रही। कवि सम्मेलन में देशभक्ति रचनाओं के विविध रंग दिखे।
कार्यक्रम की शुरुआत कवि अंकित चहल ने की। उन्होंने तिरंगे की महिमा और उसकी ज़रूरत पर जोर डालते हुए पहली कविता पढ़ी-
हर ओर तिरंगा फहरा दो
वेदों का ज्ञान तिरंगा हो
आयतें कुरान तिरंगा हो
पहली पहचान तिरंगा हो
अपना भगवान तिरंगा हो
जीएं तो जान तिरंगा हो
मरकर सम्मान तिरंगा हो
ऐसा वरदान तिरंगा दो
हर ओर तिरंगा फहरा दो।
देश की रक्षा में अपना बलिदान तक दे देने वाले सैनिकों के सम्मान में भी उन्होंने कविता पढ़ी,
इन बर्छी तीर कृपाणों से तोपों के गर्म दहानों से
युद्धों के सकल समानों से हां पर्वत से या मैदानों से
इन बर्फीले तूफानों से पूछो इन रेगिस्तानों से
जब अगन देश की जलती है सब छोड़ जवानी चलती है
सरहद पर चढ़ने से पहले दुश्मन को दलने से पहले
भारत के अमर सपूतों ने, माता के वीर सपूतों ने
भारत माता के चरणों में ये शीश झुकाया है
माटी को उठाया है माथे से लगाया है।
मयंक शर्मा मूलत: गीतकार हैं उनकी सृजनशीलता उत्साह और संवेदनशील अनुभूतियों से भरपूर है। आज जो गीत उन्होंने प्रस्तुत किया उसका संदर्भ यूं था- सरहद पर तैनात एक सैनिक जब अपने परिवार से संवाद करता है तो परिवार के लोग उससे क्या अपेक्षा करते हैं। गीत के बोल हैं-
तुम्हारे आने की चाह में हैं
मगर जो आना विजय से आना
ये ऋण जो हम पे है मातृभूमि का
अदम्य साहस से तू चुकाना
हवाएं गाएंगी यश तुम्हारा
गगन में गूंजेगी शौर्यगाथा
खड़ी हूं देहरी पे थाल ले के
तभी मैं पूजूंगी तुम्हारा माथा
सैनिक की पत्नी की मनोस्थिति का वर्णन करते हुए मयंक शर्मा ने पढ़ा,
प्रणय के मौसम तो फिर भी होंगे,
न जान देने की ऋतु मिलेगी
जो लौट आओगे जीतकर तुम तो चमन की एक कली खिलेगी
कली के रंगों को हाथ लेकर ये मांग मेरी तुम्हीं सजाना
तुम्हारे आने की चाह में हैं, मगर जो आना विजय से आना।
बचपन से ही गीत लिखने का शौक रखने वाले कवि श्री राम पाण्डेय ने तिरंगे के तीनों रंगों का अर्थ कविताओं के रूप में बयान करते हुए किया। उन्होंने तिरंगा में मौजूद केसरिया, श्वेत और हरे रंग का अर्थ बताते हुए पढ़ा,
तीन रंग से बना तिरंगा मेरी जान है
इस तिरंगे से बना ये मेरा हिंदुस्तान है।
सुमेधा शर्मा ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर बेटियों और महिलाओं की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए सशक्तिकरण पर अपना काव्यपाठ केंद्रित किया। उनकी पंक्तियां थीं-
रग-रग घाव से व्यथित और पीड़ित है आज युवा पीढ़ी को परिस्थिति निहारती
फिर घननंद फन फुफकारने लगे हैं, फिर चंद्रगुप्त की ये धरती पुकारती
घाव निज भूमि के जो धोते निज रक्त से हैं उनको सपूतों सा दुलारती मां भारती
इस पुण्य भूमि पर इतने शहीद हुए क्यों न गाऊं मैं भी मातृ भारती की आरती।
इसके बाद सुमेधा ने अंग्रेजों से लोहा लेने वाली महान स्वतंत्रता सेनानी रानी लक्ष्मीबाई की स्मृति में पढ़ा,
अपने शौर्य पराक्रम से वीरत्व हृदय में घोल दिया
अमर जवानी क्या होती है तलवारों से बोल दिया
नई दुल्हन की सेज छोड़कर रणभूमि की शान बनीं
लक्ष्मी तुम दुर्गा बनकर इस भारत का अभिमान बनीं।
गाजियाबाद के कवि भारत भूषण शर्मा ने एक सैनिक और उसके परिवार की मनोस्थिति की तस्वीर कविता के माध्यम से खींचने का प्रयास किया। उन्होंने पढ़ा,
आंखें नहीं नम और दिल में न गम कोई हंसता वो हाता हड़ी मौज में चला गया
मोह और मतता के बंधन तो काटे किंतु ऐसा नहीं सत्य की ही खोज में चला गया
चूम चरण मां के बैठा जब ट्रेन में तो मां का दिल था कि थोड़ा सोच में चला गया
किंतु बाप ने उठा के शीश छाती ठोंक कहा देखो मेरा बेटा देखो फौज में चला गया।
नीतेश राजपूत ने देश की एकता और अखंडता पर कविता पढ़ी। उनकी कुछ पंक्तिया इस प्रकार थीं-
कानों में आवाज़ गूंजते ही वंदे मातरम गर्व से सभी का जहां सीना तन जाता है
बात जब देश की अखंडता की हो यहां तो बच्चा-बच्चा भी भगत सिंह बन जाता है
प्रेम बल शौर्य बल सबको मिला दो अगर एक ही प्रिय शब्द हमको दिखता है
सिंह जन्म लेता जहां मां की हर कोख से नाम उस देश का ही हिंद कहलाता है।
स्वदेश यादव कवि के साथ समाजसेवी भी हैं और ओजपूर्ण कविताओं के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने राजनीति से लेकर खेल के मैदान तक सक्रिय बेटियों के शौर्य पर कविताएं पढ़ी, उसके बाद शहीदों पर बेहतरीन काव्यपाठ से दर्शकों का ध्यान खींचा।
उन्होंने पढ़ा
बेटियों पर प्रतिबंध चाहे जितना लगा हो नव स्वप्न फिर भी सजाती रहीं बेटियां
खेल का मौदान या कि राजनीति का हो क्षेत्र नए कीर्तिमान भी बनाती रहीं बेटियां
बेटियों ने युद्ध से भी हाथ नहीं खींचे कभी राष्ट्र स्वाभिमान को बढ़ाती रहीं बेटियां
बेटियां ही झलकारी और हाड़ी रानी बनीं निज शीश काट के चढ़ाती रहीं बेटियां
अमर स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद की शहादत को नमन करते हुए स्वदेश यादव ने पढ़ा,
शौर्य और साहस की बात जब भी उठेगी तब तब याद आएंगी वही कहानियां
मातृ भारती की रक्षा हेतु मां के लाडलों ने होम कर डालीं चढ़ती हुई जवानियां
एक हाथ पिस्टल पे दूजा हाथ मूछों वाले अब भी छपी हुई हैं दिल में निशानियां
शेखर का सीना नहीं चीरने की हिम्मत थी, अंग्रेजी गोली ठोकती रहीं सलामियां।
पीयूष मालवीय वीर रस के कवि हैं और अलग अंदाज़ में काव्यपाठ करते हैं। उन्होंने गणतंत्र दिवस मनाने और आज़ादी की लड़ाई में शहीद हुए बलिदानियों पर एक छंद पढ़ा-
गणतंत्र दिवस मनाने हेतु भारत के पिताओं ने बेटे अपने जवान दे दिए
बहनों ने भाई की कलाई पर लपेटकर राखी ही नहीं दी सारे अरमान दे दिए
माओं ने कलेजे के दिए हैं टुकड़े हजार हंसते हुए जो सीमा पर जान दे दिए
गणतंत्र दिवस मनाने हेतु नारियों ने सर पे सजे हुए सिंदूरदान दे दिए।
दर्शक लगातार लाइव प्रसारण के साथ जुड़े रहे और कमेंट बाॅक्स में अपनी प्रतिक्रियाएं देते रहे। कुल मिलाकर देश के नाम गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित कवि गोष्ठी ने दर्शकों का मन मोह लिया।
एक बार फिर इस काव्य कैफे को देख सकते हैं।
यूट्यूब पर देखने के लिए यहां क्लिक करें: https://www.youtube.com/watch?v=Tmfr6ogspzM&t=139s
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5 वर्ष पहले