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भारत रंग महोत्सव 2025: भारत भवन में 'भारंगम' 'पुनश्च कृष्ण' का मंचन

शकील खान

Halchal
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शकील खान

कला समीक्षक 

'यूं ही नहीं कहा जाता 'कृष्ण की लीला अपरंपार है'। सचमुच में कृष्ण की लीला अपरंपार है', अगिनत है। ऐसे में श्रीकृष्ण की कहानी को डेढ़ घंटे में समेटकर रंगमंच पर अवतरित करना एक टेढ़ी खीर है। धर्म के पक्ष को अलग करके रखें और रचनात्मक दृष्टि से देखें तो श्रीकृष्ण ऐसा चरित्र है जिस पर सबसे ज्यादा काम किया गया है। फिर चाहे वो फिल्म हो, चित्रकारी हो, नृत्य, गीत या संगीत या फिर थिएटर।

दरअसल, श्रीकृष्ण जनमानस में इतने ज्यादा घुले-मिले हैं कि उन पर कोई भी नया रचनात्मक काम करना किसी चुनौती से कम नहीं। दूसरी विधाओं के मुकाबले रंगमंच और फिल्म तो और भी ज्यादा दुरूह है, क्योंकि इसमें दर्शक को घंटे-दो घंटे परदे के सामने बिठाकर रखना पड़ता है। दर्शक तभी आपको अपना समय देगा जब आप उसको कुछ नया और अनूठा दोगे। फिल्म के मुकाबले रंगमंच प्रदर्शन और ज्यादा कठिन है, क्योंकि यहां सीमित साधन और छोटा सा स्थान है।

बहरहाल, मुद्दे पर आते हैं। भोपाल के भारत-भवन में चल रहे 'भारत रंग महोत्सव' नाट्य समारोह में दूसरे दिन मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय के युवा छात्र-छात्राओं ने अपने निदेशक टीकम जोशी के निर्देशन में इस चुनौती को न सिर्फ स्वीकार किया, बल्कि उस पर खरा होकर भी दिखाया। उन्होंने दर्शकों को पूरे डेढ़ घंटे अपने मोहपाश में बांधे रखने में सफलता हासिल की।

समारोह के उद्घाटन अवसर पर एनएसडी दिल्ली के संकाय सदस्य और इस अखिल भारतीय समारोह के संयोजक रामजी बाली ने कहा था कि-
'भारंगम' के नाटकों का भोपाल में आयोजन दूसरे शहरों के मुकाबले बहुत सरल है। क्योंकि यहां की नस-नस में रंगकर्म बसा हुआ है, यहां न साधन की कमी है और न ही किसी और तरह की परेशानी।

जाहिर है उनकी ये बात दूसरे दिन ही तब सार्थक साबित हो गई जब गुरुवार की शाम प्रस्तुति देने वाले श्रीलंकाई नाट्य दल का भोपाल आना निरस्त हो गया। किसी और शहर में ऐसा होता तो दूसरे दिन का शो होना मुश्किल हो जाता, क्योंकि 'भारंगम' में नाटकों का एक स्तर है, किसी भी समूह को पकड़कर, अचानक पकड़कर नाटक नहीं कराया जा सकता।

ऐसे में मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय के विद्यार्थियों की टीम सामने आई। उसने न सिर्फ एनएसडी को परेशानी से उबारा बल्कि कार्यक्रम को एक नई ऊर्जा से सराबोर भी किया। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से पास आउट वरिष्ठ रंगकर्मी और वर्तमान में मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय, भोपाल के निदेशक टीकम जोशी के निर्देशन में मंचित यह नाटक था - 'पुनश्च कृष्ण'। नाटक का लेखन किया है - रमा यादव ने।

श्रीकृष्ण चूंकि सर्वव्यापी हैं इसलिए उनकी कथाएं भी कम नहीं। वे विभिन्न रूपों और चरित्रों के साथ अनेक लोगों से संबद्ध हैं। नाट्य आलेख में भी उनकी एकाधिक कथाएं समाहित हैं, इसलिए मुश्किल था कि कृष्ण का चरित्र निभाने वाले कलाकार को अलग-अलग दृश्यों में अलग-अलग रूप में कैसे दिखाया जाए? इससे निपटने के लिए निर्देशक ने कृष्ण को छ: रूपों में पेश किया, छ: कलाकार श्रीकृष्ण के रूप में दर्शकों से रूबरू हुए।

विषय विस्तृत था और भव्यता की मांग करने वाला था, पर निर्देशक ने भव्यता के स्थान पर सहज रचनात्मकता को चुना और साधारण प्रॉप्स का उपयोग किया। रंगमंच की बनावट में भी तामझाम से बचा गया और थोड़ा सा उतार-चढ़ाव करके नाटकीयता पैदा की गई। यहां रंगमंच की बनावट के लिए दिनेश नायर की तारीफ की जाना लाजमी है।

रंगमंच जरूर साधारण था लेकिन पोशाक के मामले में पूरी नाटकीय स्वतंत्रता का इस्तेमाल किया गया। वर्तमान वृंदावन की सखियों (विधवाएं) के कृष्ण दर्शन के निवेदन से कथानक की शुरुआत होती है। उनकी पोशाक बहुत प्रासंगिक और आंखों को भाने वाली थी। कृष्ण के वस्त्र विन्यास उनके अनुरूप थे ही।

कलाकारों के अभिनय की प्रशंसा किए बिना नाटक के बारे में बात संभव नहीं। विद्यार्थियों ने दर्शकों और रंगमंच के जानकारों को बता दिया कि नाट्य विद्यालय में अभिनय का पाठ ठीक से पढ़ाया जा रहा है। आंगिक अभिनय हो या चेहरे की भंगिमाएं कलाकारों ने सबसे न्याय किया। नाटक के निर्देशक और नाट्य विद्यालय के निदेशक दोनों ही रूपों में टीकम जोशी की पीठ थपथपाई जा सकती है।

बहरहाल, सभी कलाकारों ने अपने काम को बेहतर तरीके से अंजाम दिया। कलाकारों की लंबी सूची है इसलिए नाम देना संभव नहीं, कुछ का नाम देना दूसरों के साथ अन्याय होगा।

प्रस्तुति की चुनौती जितनी निर्देशक के सामने थी उतनी ही लेखक के सामने भी थी। सब कुछ तो लिखा जा चुका है, सब कुछ पढ़ा जा चुका है। नया क्या ? इस चुनौती से पार पाते हुए लेखक रमा यादव ने उन सवालों को अपने आलेख का आधार बनाया जो अमूमन कृष्ण के बारे में उठाए जाते रहे हैं। 

सवालों की बानगी देखिए-
-आप चाहते तो महाभारत का युद्ध रुक सकता था। आपने रोका क्यों नहीं? 

-कर्ण का सवाल है मेरी मुक्ति क्यों नहीं? 
-सखियां पूछती हैं हमारी हालत ऐसी क्यों?
-राधा की अपनी ही समस्या है, अलग तरह के प्रश्न हैं?
-मईया इसलिए परेशान हैं कि मुझे छोड़ क्यों गया?
-बलराम कुछ और ही जानना चाहते हैं?

प्रश्नों का पिटारा है, सवाल बहुत सारे हैं, मुश्किल है, लगता है इनका तो कोई उत्तर हो ही नहीं हो सकता, लेकिन कृष्ण तो ठहरे कृष्ण। मुश्किल प्रश्नों के सामने निर्लिप्त भाव से मुस्कुरा रहे हैं, लेकिन निरूत्तर नहीं हैं। यूं ही तो उन्हें भगवान का दर्जा नहीं दिया गया है, बेशक प्रश्न कठिन हैं, जरूरी और सार्थक भी। कृष्ण के पास न सिर्फ सभी प्रश्नों के जवाब हैं बल्कि वे शिष्ट और विनम्रता से दिए गए उत्तर पूछने वाले को संतुष्ट करते हैं। नाटक की प्रस्तुति दर्शकों तक यह संदेश पहुंचाने में सफल होती है, यही नाटक की सफलता है, यही लेखक की और यही निर्देशक की, कलाकारों की भी। कह सकते हैं 'पुनश्च कृष्ण' कठिन प्रश्नों का सरल उत्तर है।
 
एक वर्ष पहले
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