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मीडिया में हिंदी: भाषा, संवाद और नई संभावनाओं पर सार्थक विमर्श

काव्य डेस्क

Halchal
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डॉ. आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, हिंदुस्तानी भाषा अकादमी एवं तिनका तिनका फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में डॉ. आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र, जनपथ, नई दिल्ली में ‘मीडिया में हिंदी’ विषय पर एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में मीडिया, पत्रकारिता और हिंदी भाषा के वर्तमान स्वरूप, उसकी चुनौतियों तथा भविष्य की संभावनाओं पर गंभीर और सार्थक विमर्श हुआ।


संगोष्ठी में डॉ. अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र के निदेशक कर्नल आकाश पाटील, हिंदुस्तानी भाषा अकादमी के अध्यक्ष सुधाकर पाठक, तिनका तिनका फाउंडेशन की संस्थापिका, लेखिका, जेल सुधारक एवं मीडिया शिक्षक प्रो. (डॉ.) वर्तिका नंदा, डॉ. अभिषेक कुमार, सहायक आचार्य, लक्ष्मीबाई कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय तथा डॉ. अनिकेत जायसवाल, सहायक आचार्य, मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय मंचासीन रहे। संगोष्ठी में विभिन्न महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के बड़ी संख्या में विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने प्रत्यक्ष तथा ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता की।

संगोष्ठी की एक विशेष विशेषता यह रही कि इसमें प्रतिभागियों को पारंपरिक शोध-पत्र प्रस्तुतीकरण के साथ-साथ दो मिनट के वीडियो के माध्यम से भी अपनी बात रखने का अवसर दिया गया। जो विद्यार्थी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सके, उन्होंने अपने विचार रिकॉर्ड कर वीडियो के माध्यम से भेजे, जिन्हें संगोष्ठी के दौरान प्रदर्शित किया गया। इसके अतिरिक्त गूगल लिंक के माध्यम से देश के विभिन्न शहरों से प्रतिभागियों ने ऑनलाइन जुड़कर अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इस प्रकार संगोष्ठी ने प्रत्यक्ष और डिजिटल, दोनों माध्यमों को एक साथ जोड़ते हुए व्यापक सहभागिता का स्वरूप ग्रहण किया।

संगोष्ठी का संचालन ध्रुव शिवहरे ने किया तथा विषय-प्रवेश वक्तव्य डॉ. अनिकेत जायसवाल के बाद डॉ. अभिषेक कुमार ने मीडिया और हिंदी के संबंध पर अपने विचार रखते हुए मीडिया में हिंदी की महत्ता को विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि मीडिया आज समाज के विचारों और भाषा को प्रभावित करने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण माध्यम है और इसलिए उसमें प्रयुक्त भाषा की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

इसके बाद डॉ. अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र के निदेशक कर्नल आकाश पाटील ने अपने संबोधन में मीडिया और हिंदी से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए। उन्होंने कहा कि वे स्वयं मीडिया विशेषज्ञ नहीं हैं और इसलिए इस विषय पर विशेषज्ञ वक्ताओं तथा प्रतिभागियों को सुनना उनके लिए अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि मीडिया आज समाज के निर्माण और विचारों के प्रसार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि डॉ. अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र अब केवल एक आयोजन-स्थल के रूप में नहीं, बल्कि शैक्षणिक, अकादमिक और वैचारिक विमर्श के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में भी अपनी भूमिका विकसित कर रहा है। उन्होंने इस प्रकार की कार्यशालाओं और परिचर्चाओं के आयोजन को केंद्र के लिए गौरव का विषय बताया।

हिंदुस्तानी भाषा अकादमी के अध्यक्ष सुधाकर पाठक ने अपने वक्तव्य में मीडिया और पत्रकारिता के बीच के अंतर को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का मूल आधार तथ्यों की पड़ताल, उनकी सत्यता की जाँच और उसके बाद उनका जिम्मेदारीपूर्वक संप्रेषण है, जबकि मीडिया व्यापक अर्थ में उन विभिन्न माध्यमों का क्षेत्र है, जिनके जरिए सूचनाएँ और विचार समाज तक पहुँचते हैं। उन्होंने इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझाते हुए कहा कि मीडिया को मनुष्य की दो आँखों की तरह देखा जा सकता है, जबकि पत्रकारिता उसकी आत्मा है। यदि आँखें तो हों, लेकिन दृष्टि और सत्य की चेतना न हो, तो मीडिया अपनी सार्थकता खो सकता है।

पाठक ने हिंदी भाषा की वर्तमान स्थिति पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि एक समय अखबारों के संपादकीय और लेख पढ़कर लोग अपनी भाषा सुधारते थे, नए शब्द सीखते थे और सही वाक्य-विन्यास समझते थे। आज प्रिंट मीडिया सहित डिजिटल मीडिया और टेलीविजन में भी भाषा संबंधी अनेक त्रुटियाँ दिखाई देने लगी हैं। उन्होंने वर्तनी, व्याकरण, उच्चारण, अनुवाद और भाषा की मर्यादा से जुड़े प्रश्नों को गंभीरता से उठाया। उन्होंने मीडिया में बढ़ते अनावश्यक अंग्रेजी प्रयोग पर भी आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा कि अंग्रेजी सीखने और बोलने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन जहाँ हिंदी के सरल और सहज शब्द उपलब्ध हैं, वहाँ केवल प्रभाव जमाने या चलन के कारण अंग्रेजी शब्दों का लगातार प्रयोग उचित नहीं है। यदि हिंदी के सहज शब्दों की जगह अनावश्यक रूप से अंग्रेजी शब्दों को अपनाया जाता रहा तो धीरे-धीरे हिंदी की अभिव्यक्ति क्षमता और उसके सामान्य प्रयोग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने मीडिया से जुड़े लोगों से भाषा के प्रति अधिक सजग और जिम्मेदार होने का आग्रह किया।

संगोष्ठी की प्रमुख वक्ता प्रो. (डॉ.) वर्तिका नंदा ने अपने सारगर्भित संबोधन में मीडिया की विकास-यात्रा को अत्यंत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने मनोरंजन-प्रधान टेलीविजन कार्यक्रमों से अपनी बात शुरू करते हुए उस दौर को याद किया, जब सीमित समय के समाचार प्रसारण हुआ करते थे। इसके बाद उन्होंने 24 घंटे के समाचार चैनलों के दौर और उसके साथ आए मीडिया के बढ़ते व्यावसायीकरण की चर्चा की। प्रो. वर्तिका ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों का उल्लेख करते हुए बताया कि 24 घंटे के समाचार चैनलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि इतने लंबे प्रसारण समय का खर्च कैसे निकाला जाए ? इसके बाद विज्ञापन और व्यावसायिक मॉडल ने समाचार चैनलों के स्वरूप को प्रभावित किया और धीरे-धीरे मीडिया के काम करने के तौर-तरीकों में व्यापक परिवर्तन आया। इस तरह उन्होंने मीडिया की यात्रा को मनोरंजन से समाचार, समाचार से 24 घंटे के प्रसारण और फिर व्यावसायीकरण तक की पूरी यात्रा प्रक्रिया को सामने रखा।

प्रो. नंदा ने विद्यार्थियों और शोधार्थियों से विशेष रूप से कहा कि उन्हें भाषा के प्रति सजग रहना चाहिए। उन्होंने मीडिया में प्रचलित ऐसे कई शब्द-प्रयोगों की ओर संकेत किया, जो भाषायी दृष्टि से उपयुक्त नहीं हैं, लेकिन लगातार इस्तेमाल के कारण आम बोलचाल में जगह बनाते जा रहे हैं। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे भाषा को केवल संचार का माध्यम न मानें, बल्कि उसकी गुणवत्ता, गरिमा और प्रभाव को भी समझें। प्रो. नंदा ने जेलों में तिनका तिनका के काम और उसके जरिए साहित्य और भाषा के विकास को लेकर कई अनजाने और रोचक प्रसंग भी सुनाए। 

संगोष्ठी के दौरान विभिन्न महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से आए विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने ‘मीडिया में हिंदी’ से जुड़े विभिन्न उपविषयों पर अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। प्रत्यक्ष प्रस्तुतीकरण के साथ ऑनलाइन प्रतिभागियों ने भी अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। पूर्व रिकॉर्ड किए गए दो मिनट के वीडियो प्रस्तुतियों को भी कार्यक्रम में प्रदर्शित किया गया। इस नवाचारी व्यवस्था ने संगोष्ठी को अधिक व्यापक और सहभागी स्वरूप प्रदान किया।

शोध-पत्र प्रस्तुतियों के बाद प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए। कार्यक्रम के अंत में डॉ. स्वाति मिश्रा, एसोसिएट प्रोफेसर एवं डॉ. आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र से संबद्ध, ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया और सभी वक्ताओं, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा सहयोगी संस्थाओं के प्रति आभार व्यक्त किया।

कार्यक्रम में हिंदुस्तानी भाषा अकादमी के वरिष्ठ सदस्य विनोद पाराशर, संयुक्त संपादक विजय कुमार शर्मा तथा उपसंपादक डॉ. वनीता शर्मा विशेष रूप से उपस्थित रहे। इसके अलावा डॉ. पूजा खन्ना, डॉ. सौरव सहित डॉक्टर अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र से जुड़े इंटर्न्स और रिसर्च एसोसिएट्स ने सक्रिय रूप से सहभागिता की। 
संगोष्ठी का संचालन हिंदुस्तानी भाषा अकादमी से जुड़े युवा सदस्य एवं उपसंपादक ध्रुव शिवहरे ने अत्यंत कुशलता से किया।

‘मीडिया में हिंदी’ विषय पर आयोजित यह संगोष्ठी केवल हिंदी भाषा के प्रयोग पर चर्चा तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने मीडिया की विश्वसनीयता, पत्रकारिता की जिम्मेदारी, भाषा की शुचिता, बढ़ते व्यावसायीकरण और डिजिटल युग में हिंदी के बदलते स्वरूप जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने रखा। विशेष रूप से विद्यार्थियों और शोधार्थियों की व्यापक भागीदारी ने यह संकेत दिया कि नई पीढ़ी मीडिया और भाषा के संबंध को लेकर गंभीरता से सोच रही है। संगोष्ठी ने यह संदेश भी स्पष्ट किया कि मीडिया जितना प्रभावशाली माध्यम है, उसमें प्रयुक्त भाषा की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। सही तथ्य, जिम्मेदार पत्रकारिता और समृद्ध एवं सहज हिंदी - इन तीनों का संतुलन ही स्वस्थ मीडिया की आधारशिला बन सकता है।
4 घंटे पहले
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