वर्ष 2018 की श्रेष्ठ कृतियों के लिए शब्द सम्मानों की घोषणा भी कर दी गई। 'छाप' श्रेणी में कविता वर्ग में गगन गिल के संग्रह ‘मैं जब तक आई बाहर’ को चुना गया है। दशक भर से ज्यादा अंतराल पर उनकी कविताओं का नया संग्रह ‘मैं जब तक आई बाहर’ प्रकाशित हुआ है। गगन गिल की कविताओं ने हिंदी कविता को एक नया मुहाबरा और नई समझ दी है। कविता संग्रह ‘मैं जब तक आई बाहर’ वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।
गगन गिल ने कविता में अपने ज़िम्मे जो काम लिया है, वह है स्त्री की पारम्परिक नियति को उद्घाटित करना। गगन स्त्री के दुखों और उदासियों को रचने वाली कवयित्री हैं। समाज की भयावह सच्चाइयां गगन गिल के यहां कविता के रूप में ढलती हैं जिससे पाठकों का सामना होता है।
दु:खों और उदासियों के अलावा गगन की कविताओं भारतीय चिंतन परंपराओं की भी गूंज भी सुनाई पड़ती है। उनकी कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है- बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह।
गगन गिल का जन्म 18 नवंबर 1959 को नई दिल्ली में हुआ। आपने अंग्रेज़ी साहित्य में एम. ए. किया है। सन् 1983 में ‘एक दिन लौटेगी लड़की’ कविता संग्रह के प्रकाशित होते ही गगन गिल साहित्यक गलियारे में एक स्थापित और नामचीन कवयित्री बन गईं।
तब से लेकर अब तक वे लगातार सक्रिय हैं। गगन गिल की कविताएं अपनी दृढ़ता और संयम से एक आने वाले परिष्कार का पूर्वबोध कराती हैं। उनकी कविताओं में स्त्री मन का एक अनुशासित लेकिन भव्य संशय और दु:खबोध है, जो अभी तक रूढ़ि नहीं बना।
गगन की अब तक पाँच कविता-संग्रह: एक दिन लौटेगी लड़की (1989), अँधेरे में बुद्ध ( 1996), यह आकांक्षा समय नहीं (1998), थपक थपक दिल थपक थपक (2003), मैं जब तक आयी बाहर (2018) एवं 4 गद्य पुस्तकें: दिल्ली में उनींदे (2000), अवाक् (2008), देह की मुँडेर पर (2018) प्ररकाशित हो चुकी हैं।
गगन गिल को साहित्यिक अवदानों के लिए 1984 में भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, 1989 में सर्जनात्मक लेखन के लिए संस्कृति पुरस्कार से नवाजा जा चुका है।
6 वर्ष पहले