अमर उजाला ने भारतीय भाषाओं के सम्मान में एक श्रृंखला 'अमर उजाला बैठक जुगलबंदी' शुरू की।
साहित्य में हर पीढ़ी के पास संघर्ष और उपलब्धि की एक निश्चित परंपरा है। बहुत कुछ बचा रह जाता है, जो लिखा नहीं गया, बोला नहीं गया और अनकहा रह गया। निजी और सामाजिक अनुभव की दुनिया, लिखने की ज़रूरत, समाज को देखने की कोशिश, लिख पाने का सुख, न लिख पाने की व्यथा को समझ पाना तभी संभव है जब संवाद हो, जुगलबंदी हो। ऐसा करना भविष्य की इबारत को पढ़ना भी है और उस समय को याद करना भी है, जो अब अपनी मुट्ठी में नहीं है।
पत्रकारिता में अमर उजाला की अपनी परंपरा रही है। हमने विचार किया है कि भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों के साथ खुले संवाद का एक क्रम शुरू हो। जिसमें एकाधिक साहित्यकार आपस में बात करें और अमर उजाला के संपादकीय साथी भी अपने सवाल रखें। यह एक तरह की खुली और आत्मीय बैठक है।
बैठक श्रृंखला की पहली कड़ी में सोमवार 25 सितंबर को प्रख्यात कवि अशोक वाजपेयी और सुप्रसिद्ध आलोचक सुधीश पचौरी की जुगलबंदी हुई।
अशोक वाजपेयी आईएएस अधिकारी रहे। मध्य प्रदेश के संस्कृति सचिव के रूप में बहुचर्चित भी। वे हिंदी कवि, आलोचक, अनुवादक, संपादक हैं। वे भारत की एक बड़ी सांस्कृतिक उपस्थिति हैं।
सुधीश पचौरी दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक, प्रसिद्ध आलोचक और प्रमुख मीडिया विश्लेषक हैं। वे 'हिंदी सलाहकार समिति' के सदस्य रहे और दिल्ली विश्वविद्यालय में डीन ऑफ कॉलेज भी बनाए गए।