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Freedom: जर्मनी की लौह महिला

काव्य डेस्क

Book Review
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किताब - फ्रीडम


लेखिका : एंजेला मर्केल
प्रकाशक : पैन मैकमिलन
मूल्य : 1,999 रुपये (हार्डकवर)

जर्मनी की लौह महिला
जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है, स्वतंत्रता इस किताब का केंद्रीय विषय है। वह कहती हैं, ‘आजादी का अर्थ मेरे लिए सीखना रोक देना नहीं है, न ही रुक जाना है, बल्कि राजनीति से विदा लेने के बाद भी चलना जारी रखना है।’ 

जर्मनी की चांसलर रहीं एंजेला मर्केल की पुस्तक, फ्रीडम इस वर्ष की उपलब्धि है। हैम्बर्ग में पैदा हुईं मर्केल ने लैपजिग स्थित कार्ल मार्क्स यूनिवर्सिटी में भौतिकी की पढ़ाई की, फिर पूर्वी बर्लिन के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिकल केमिस्ट्री विभाग से जुड़ गईं। एंजेला मर्केल विगत जुलाई में सत्तर साल की हो गईं और उनके जीवन के शुरुआती पैंतीस साल कम्युनिस्ट पूर्वी जर्मनी में बीते थे। यह जानना भी बेहद दिलचस्प है कि 1989 में जब जर्मनी की दीवार टूटी, उसी वर्ष मर्केल के राजनीतिक जीवन की भी शुरुआत हुई।

जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है, स्वतंत्रता इस किताब का केंद्रीय विषय है। वह कहती हैं, ‘आजादी का अर्थ मेरे लिए क्या है, ताउम्र मैं इस प्रश्न से जूझती रही हूं। स्वाभाविक रूप से मैं इसका राजनीतिक अर्थ ढूंढ रही थी, क्योंकि किसी देश में आजादी उसकी राजनीतिक स्थिति से जुड़ी होती है। लोकतंत्र के बिना कोई आजादी नहीं है, कानून का शासन नहीं है और मानवाधिकार की रक्षा भी नहीं है। लेकिन यह प्रश्न मुझे एक दूसरे मोर्चे पर भी मथता रहा है। मेरे लिए आजादी यह जानने का कारण भी है कि मेरी सीमा कहां तक है। आजादी का अर्थ मेरे लिए सीखना रोक देना नहीं है, न ही रुक जाना है, बल्कि राजनीति से विदा लेने के बाद भी चलना जारी रखना है।’

नवंबर, 2005 में वह जर्मनी की पहली महिला चांसलर बनी थीं और सोलह साल तक चांसलर रहते हुए उन्होंने जर्मनी को कई चुनौतियों से उबारा, चाहे वह वित्तीय संकट हो, यूरोप का कर्ज और प्रवासी संकट हो या फिर कोरोना। फोर्ब्स मैगजीन ने लगातार दस साल तक उन्हें दुनिया की सबसे ताकतवर महिला का दर्जा दिया, तो वह पश्चिम में उदारवादी जीवन मूल्यों की रक्षक और महिलाओं के रोल मॉडल के रूप में देखी गईं। उन्होंने इसका जिक्र किया है कि कैसे दुनिया के ताकतवर राजनेताओं के साथ महत्वपूर्ण बैठकों के दौरान कमरे में वह इकलौती महिला होती थीं। दिसंबर, 2021 में उन्होंने ओलाफ शुल्ज को सत्ता सौंप दी। तबसे वह लगातार नेपथ्य में हैं, और अपनी मध्यमार्गी दक्षिणपंथी पार्टी द क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन की दैनंदिन गतिविधियों से भी दूर ही रहती हैं।     
    
हालांकि यूक्रेन पर रूस के हमले ने जर्मनी और उसके बाहर मर्केल की छवि पर असर डाला, क्योंकि वह रूस को हमला करने से रोक नहीं पाईं। एक मजबूत महिला राजनीतिज्ञ की छवि बनाने के बावजूद उन पर यह आरोप लगा कि उन्होंने जर्मनी जैसे एक बेहद मजबूत यूरोपीय राष्ट्र को कई मामलों में रूस और चीन पर निर्भर बना दिया। मर्केल पर यह आरोप भी लगा कि शरणार्थियों के प्रति सहानुभूति का भाव दिखाकर उन्होंने जर्मनी में धुर दक्षिणपंथी एएफडी पार्टी के उभार में मदद की। अपने संस्मरण में मर्केल ने अपने ऊपर लगे इन आरोपों का भी कमोबेश जवाब दिया है।    

किताब में उन्होंने अपने बचपन, जवानी और राजनीतिक दौर का बेबाक वर्णन किया है। वह बताती हैं कि पहले उन्हें खाना बनाने का शौक था, लेकिन बाद में राजनीतिक व्यस्तता के चलते उन्हें इसे बंद करना पड़ा। पुस्तक में इसका भी वर्णन है कि कुत्तों से डरने वाली मर्केल के साथ एक बैठक में मजाक करते हुए पुतिन ने अपने एक कुत्ते को बुला लिया था। लंबे समय तक राजनीतिक सलाहकार रहीं बियाटे बाउमन के साथ मिलकर मर्केल ने यह दिलचस्प किताब लिखी है।
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