ए मेरी जमीं मेवाड़ भूमि ,
मेरी नस - नस में तेरा इश्क बहे ।
मैं बचा रहा तेरी शान सदा,
चाहे जान मेरी यह रहे ना रहे ।
रणभूमि मेरी हल्दीघाटी ,
तेरा ही तो हिस्सा है।
लड़ रहा मैं वैरी से मां,
तेरा ही यह किस्सा है ।
आन बान और मर्यादा का ,
पढ़ा जो मैंने किस्सा है।
लड़ता रहे यह प्रताप तेरा ,
तेरा ही ऐसा है हिस्सा है ।
ओ मेवाड़ भूमि मेरी पुण्य भूमि ,
तेरे खातिर युद्ध लडू ।
मैं लड़ता रहू वैरी से मां,
तेरा ही तो नाम करूं ।
ओ चित्तौड़ भूमि मेरी जन्मभूमि,
पूर्वज तुझ पर कुर्बान हुए ।
ना रखा कदम पीछे कभी ,
तेरे उन वीर पुरखो ने ।
ना छोड़ी कभी इस धरती को मां ,
तेरे उन वीर बेटों ने ।
मर मिटे हैं तुझ पर ही मां ,
उनमे तेरा खून था ।
जौहर की इन ज्वालाओ ने,
क्षात्र धर्म की माताओं ने ,
पुण्यभूमि पर नाम किया ।
आन - बान और शान के खातिर,
जौहर को तो जन्म दिया।
इस पुण्य भूमि पर मीराबाई ने ,
राजसिंहासन त्याग दिया ।
राजकुल के खातिर पन्ना ने ,
चंदन का बलिदान किया।
कवि - चंदन सिंह सारंगदेवोत
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