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उर्दू शायरी को नया लबो-लहजा देता शायर विपुल कुमार

विपुल कुमार
                
                                                         
                            
'वक़्त की ताक़ पे दोनों की सजाई हुई रात 
किस पे ख़र्ची है बता मेरी कमाई हुई रात 

और फिर यूं हुआ आंखों ने लहु बरसाया 
याद आई कोई बारिश में बिताई हुई रात' 


इन अश्आर को क़लमबंद करने वाले नौजवान शायर विपुल कुमार मुशायरों की दुनिया में रफ़्ता-रफ़्ता अपनी पहचान बना रहे हैं। शोर-शराबे से इतर मुशायरों में वो बहुत संजीदगी से अपना कलाम पेश करते हैं। उर्दू विपुल की मातृ भाषा नहीं है, लेकिन उनके शेर कहने और गुफ़्तगू करने के अंदाज़ में उर्दू की लज़्ज़त ऐसी है कि वो माहिरे उर्दू जान पड़ते हैं। 24 साल के विपुल पूरी तरह खुद को मुशायरों से वाबस्ता नहीं रखते, इसके अलावा वो एक ऑनलाइन कंपनी में प्रॉडक्ट मैनेजर हैं। बावजूद इसके वो शायरी और प्रोफ़ेशनल लाइफ़ में एक बेहतर तालमेल बनाए रखते हैं। अमर उजाला काव्य के साथ बातचीत में विपुल कुमार ने उर्दू शायरी से नज़दीक आने के बारे बताया। वो कहते हैं, "मेरी शायरी का सफ़र क़रीब 7 साल से जारी है। इनमें तीन-चार साल मैंने कविताएं और बिना बहर की ग़ज़लें कहीं, जो शायरी की बारीकियों के मुताबिक़ सही नहीं थीं। हालांकि, उसके बाद कुछ अच्छे लोग मिले जिन्होंने मुझे उर्दू पढ़ना-लिखना और ग़ज़ल की बारीकियां सिखाईं।"
 
सोशल मीडिया किसी की ज़िंदगी में कितना अहम रोल अदा कर सकता है इसकी एक मिसाल विपुल ख़ुद हैं। राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले के रहने वाले विपुल की ग़ज़ल की पहली बार इस्लाह (सुधार) फ़ेसुबक पर एक अंजान शख़्स ने की थी, हालांकि आज वो शख़्स उनके दोस्त है। विपुल मानते हैं कि यहीं से उनके अंदर एक शायर ने सांस लेना शुरू किया। वो बताते हैं, "जहां तक मुझे याद है यह क़रीब चार साल पहले की बात है। फ़ेसबुक पर तरही मुशायरे वग़ैरह हुआ करते थे। जिगर मुरादाबादी साहब का एक मिसरा था उसपर मैंने एक ग़ज़ल कही थी। उसका एक शेर था 'जो चमन में अब के खिला नहीं वो मेरी हसरतों का गुलाब था, मेरा फसले गुल से हिसाब है मेरा क़र्ज़ है यह बहार पर।' दिल्ली में एक पराग अग्रवाल हैं जो अब दोस्त हैं, उन्होंने मुझे मैसेज करके बताया कि इस ग़ज़ल में थोड़ी-थोड़ी चीज़ें ग़लत हैं लेकिन शेर बहुत अच्छे हैं। यहां दिल्ली आ जाओ और हम लोगों से मिलो। 

मैं समझता हूं कि वहां से इस सफ़र का आगाज़ हुआ। तब मुझे पता चला कि और लोग किस तरह शायरी कर रहे हैं। ख़ासकर दिल्ली में जो अदबी हल्क़े हैं वो किस तरह उम्दा शायरी कर रहे हैं। मैं हनुमानगढ़ से हूं। मैं वहां किसी ऐसे शख़्स को नहीं जानता जिसे उर्दू आती हो। लिखना पढ़ना तो दूर की बात। ग़ज़लें सुनते भी बहुत कम लोग देखें हैं। वहां से तरबीयत इस तरह की नहीं हुई कि ग़ज़ल कही और पढ़ी जाए। शेर-ओ-शायरी से मोहब्बत ख़ास तौर पर मौसीक़ी (संगीत) से शुरू हुई। जगजीत सिंह, गु़लाम अली और मेहंदी हसन को सुनना मुझे काफ़ी पसंद था। इनको सुनते हुए मेरे ज़हन में ख़्याल आता कि यह ग़ज़लें कितनी ख़ूबसूरती से लिखी गई हैं, इन्हें लिखता कौन होगा?" 

जब घर में कोई परंपरा से हटकर कुछ करता है तो अक्सर मां-बाप अपने बच्चों की हिमायत नहीं करते। शुरुआत में विपुल के मां-बाप इस बात से अंजान थे कि उनका बेटा शायरी करता है। लेकिन जब उन्हें विपुल की तख़्लीकी सलाहियतों (रचनात्मक कौशल) का पता चला तो उन्होंने ख़ूब हौसला अफ़्ज़ाई की। विपुल बताते हैं, "हमारे यहां हो सकता है दूसरे शायर हों, लेकिन उर्दू हल्क़े में पहचाना जाने वाला कोई शायर नहीं है। तीन-चार साल तक तो मां-बाप को पता ही नहीं था कि मैं शायरी करता हूं। क्योंकि तब ज़्यादा लोग जानते नहीं थे। घर वाले फ़ेसबुक इस्तेमाल करते नहीं हैं तो उन्हें इस बारे में ज़्यादा मालूमात नहीं थी। जब प्रोग्राम होने लगे और वीडियो आने लगीं तब जाकर उन्हें पता चला मैं शायरी करता हूं। वो मेरी शेर-ओ-शायरी को लेकर बहुत ज़्यादा ख़ुश हैं। जब भी कहीं प्रोग्राम होता है वो उसकी वीडियो या फोटो देखते हैं।"
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"शायरी की दुनिया के लोग काफ़ी हमदर्द हैं"

8 वर्ष पहले

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