ताकि तुम सुन सको मुझे
मेरे शब्दों को
कभी-कभी वे होते विरल
समुद्री चिड़ियों के पदचिन्हों-से समुद्र-तटों पर
यह गलहार मदमस्त घंटी
छैलकड़ी तुम्हारे अंगूरी नरम हाथों के लिए
और मैं देखता हूँ अपने शब्दों को एक लम्बी दूरी से
मुझ से बहुत अधिक वे तुम्हारे हैं,
लता की तरह मेरी पुरानी पीड़ाओं पर वे करते आरोहण
जो चढ़ती सीलन-भरी दीवारों पर इसी तरीक़े से,
इस निष्ठुर क्रीड़ा के लिए दोषी हो तुम,
वे निकल भागते मेरे उदास-अंधेरे बिछौने से,
सब कुछ भर देती हो, तुम भर देती हो सब कुछ
तुमसे पहले आबाद कर देते हैं मेरे शब्द
उस एकान्त को, जहाँ तुम जगह लेती हो,
और तुम्हारी बनिस्बत मेरी उदासी में अधिक काम के हैं वे !
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