आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप
करते नहीं कोई यात्रा,
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की ध्वनियां,
करते नहीं किसी की तारीफ़।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप
मार डालते हैं अपना स्वाभिमान
नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप
बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,
नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग, या
आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप
हीं महसूस करना चाहते आवेगों को,
और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को,
वे जिनसे नम होती हों आपकी आंखें,
और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को।
आगे पढ़ें
कमेंट
कमेंट X