आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Vishwa Kavya: जिम्बाब्वे के निर्वासित कवि चेन्जेराई होव की कविता- इनकार

विश्वकाव्य
                
                                                         
                            पुलिस जब आ ही जाए ऐन सिर पर
                                                                 
                            
और उसकी लाठी नृत्य करने लगे
तुम्हारी पीठ पर
इनकार कर देना झुकने से ।

बिच्छू जब आ ही जाएँ
और डंक मार दें चाहे
तुम्हारी आँखों और कानों पर
इनकार कर देना उनके वश में आने से ।

दुनिया जब घूमती नज़र आए गोल-गोल
यातना-कक्ष के भीतर
साफ़ इनकार कर देना चाहिए
तुम्हारे दिल को मुरझाने से ।

तुम सुनना बच्चों की आवाज़ों को
देखना रंगत हमारे संगीत की
और नाच उठना मन ही मन
समर्पण की मौत पर ।

जिस क्षण शक्तिसम्पन्न लोग
लूटने में लगे हों तमगे
और अशक्त चुन रहे हों
किनके शासन के
तुम इनकार कर देना घुटने टेकने से
फुटपाथ पर छल और कपट के ।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : राजेश चन्द्र

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें। 

एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर