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वायरल: पटरी से उतरते ही ख़त्म हो जाती हैं रेल और ज़िंदगी...

मुजफ्फरनगर रेल हादसा
                
                                                         
                            पटरी से उतरते ही ख़त्म हो जाती हैं 
                                                                 
                            
रेल और ज़िंदगी कितनी एक-सी हैं 

हम बचाते रह गए दीमक से अपना घर
कुर्सियों के चन्द कीड़े सारा मुल्क खा गए

लोग कहते हैं की पत्थर नही रोते हैं ,
हमने पहाड़ों से दरिया निकलते देखे हैं 

रोज रोज गिर कर कितना मुकम्मल खड़ा हूँ
ज़िंदगी देख मैं तुझसे कितना बड़ा हूँ

कभी उम्मीदें उधड़ जाये तो, मेरे पास ले आना 
मैं हौसलों का दर्ज़ी हूँ, मुफ़्त में रफ़ू कर दूंगा 

एक सुकून सा मिलता है तुझे सोचने से भी 
फिर कैसे कह दूँ मेरा इश्क़ बेवजह सा है 

बेवजह अब ज़िंदगी में प्यार के बीज ना बोये कोई 
मोहब्बत के पेड़ हमेशा ग़म की बारिश ही लाते हैं 

मुझे इश्तिहार सी लगती है ये मुहब्बत की कहानियां
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो 

जितना ही मेरा मिज़ाज है सादा 
उतने ही मुझे उलझे हुए लोग मिले 

मुफ़्त में लूट लेती है दुनिया उन्हें 
जिन्हें खुद की क़ीमत का एहसास नहीं होता 


(ये शायरी इंटरनेट की दुनिया में लोकप्रिय है। इनके रचनाकार का नाम पता नहीं चल सका। अगर आपको लेखक का नाम मालूम हो तो ज़रूर बताएं। शायरी के साथ शायर का नाम लिखने में हमें ख़ुशी होगी।)
9 वर्ष पहले

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