जिन पिताओं को पूर्वाभास था कि
उनकी बच्चियां अंधेरों से डरती हैं
उन्होंने क्यों नहीं सिखाया अंधेरो से लड़ना!
या कुछ दूर साथ चलकर राह में पड़ने वाले गड्ढों और खाइयों का सही अंदाज लगाना ही सिखा देते!
वे उलझे रहे स्वयं में नहीं देखा कि उनसे निकली एक कोमल छाया अकेली रह गयी है!
पिता को कभी ये भी बता देना चाहिये
मेरी जैसी छाया देखकर हमेशा छूने की कोशिश न करना
क्यों कि कभी-कभी किसी जगह मैं भूल जाता हूँ कि मैं पिता हूँ और बन जाता हूँ बस पुरुष
पिता को विभीषण बनकर बच्चियों को बताना चाहिए अपनी जाति का वो अभेद अचूक अहिंसावादी हथियार मैं तुमसे प्रेम करता हूँ !
जिससे स्त्रियां हमेशा हारती रहीं !
अगर कभी ये भी चूक जाये तो एक ब्रहास्त्र भी हम रखते स्त्रियों को जीतने के लिए
उनकी करुणा के आगे डाल देते हैं अपना दुःख ,जिसमें वो फ़सतीं ही हैं !
उन्हें बस मैथ के समीकरण इतिहास की तारीखें समझाना काफी नहीं
सारी शिक्षा के साथ एक मुख्य नस्ल की विशेषता बताना भी जरूरी है
कम से कम अपनी प्रजाति को ठीक से पहचानना
हर पिता को सिखा देना चाहिए अपनी बच्चियों को ।
हमने ये कविता रूपम मिश्र की फेसबुक वॉल से प्राप्त की है ।
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