मुझे लगा कि बारिश होगी
तो बह जायेगा दुःख
पर बहा नहीं
आंखों से बिखरा
फिर हरा हुआ दुःख
मुझे लगा कि तुम आओगे
तो नहीं रहेगा दुःख
पर गया कहाँ
झांकता रहा तुम्हारे कंधों के पीछे से
संग- साथ रहा संशय की तरह
मुझे लगा जब दिन बीतेंगे
बीत जायेगा दुःख
पर बीतते रहे दिन
रीतता रहा जीवन
और रेत की तरह चिपका रहा दुःख
मुझे लगा कि क्षण बिसरेगा
तो बिसरेगा दुःख
पर चुभा रहा स्मृतियों की देह पर
सूई की तरह
चमकती रही उसकी देह
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