धूप में बादल बनेंगे यह वचन देकर गए जो
वे महासागर हमारी प्यास से परिचित नहीं हैं !
फूल उन पर चढ़ सकें
तो बाग हमने नोच डाले,
होम में हम खुद जले हैं
तब गए उनतक उजाले,
वे कहाँ बैठे हुए हैं क्या कहें किससे बताएं
वे समय-स्वामी अगर उपवास से परिचित नहीं हैं !
राज महलों ने निकाला
हम भटकते फिर रहे हैं,
या समय के फेर से
हम उठ रहे हैं गिर रहे हैं,
देखकर ये दृश्य फिर फिर मन हमारा कह रहा है
आतताई राम के वनवास से परिचित नहीं हैं !
आगे पढ़ें
कमेंट
कमेंट X