आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सोशल मीडिया: वे  महासागर  हमारी प्यास से परिचित नहीं हैं !

सोशल मीडिया पोएट्री
                
                                                         
                            धूप  में  बादल बनेंगे  यह वचन देकर गए  जो
                                                                 
                            
वे  महासागर  हमारी प्यास से परिचित नहीं हैं !

फूल  उन  पर  चढ़ सकें  
तो बाग हमने नोच डाले,
होम में हम खुद जले  हैं 
तब  गए  उनतक उजाले,

वे  कहाँ  बैठे  हुए  हैं  क्या  कहें  किससे  बताएं
वे समय-स्वामी अगर उपवास से परिचित नहीं हैं !

राज महलों ने  निकाला 
हम भटकते फिर  रहे हैं,
या   समय   के  फेर  से 
हम उठ रहे हैं गिर रहे हैं,

देखकर ये दृश्य फिर फिर मन हमारा कह रहा है 
आतताई  राम  के  वनवास  से  परिचित  नहीं हैं !
आगे पढ़ें

4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर