इक था प्रद्युम्न
निकला था घर से आज इक नन्हा परिन्दा
छोटी सी उम्र में पढ़ने के लिए
किसे पता था रहेंगे उसके सपने अधूरे
जो थे आसमान में उड़ने के लिए
मासूम सी थी सूरत उसकी
जो सबको मोह लेती थी
अजनबी होता था जो उसके लिए
हंसी उसकी उसे भी खुशी देती थी
मासूमियत छलकती थी जिसके लफ़्ज़ों से
वो दरिन्दगी का शिकार हो गया
सदमे में था जहां मोहल्ला
और उसका परिवार रो-रो कर बीमार हो गया
क्या हाथ नहीं कांपे उस हैवान के
जिसने चंद पलों में इक मां की ख़ुशियां छीन ली
कैसे समाज में रहता है तू सुभाष
इंसानियत को इक अजीब सी घिन्न दी
क्या मिलेगी उसके क़ातिलों को सज़ा
आज अंधे क़ानून में इक नई उम्मीद ढूंढ रहे हैं
कैसे भूलेंगे उस मासूम के वो अल्फाज़
जो उसने अपनी तोतली ज़ुबान में कहे हैं
हैवानियत को भी शर्म आई होगी
जब उस परिंदे की चीख़ निकली होगी
क्या होगी सज़ा उन हैवानों को
क्या हमारी सरकार थोड़ी सी भी पिघली होगी
- सुभाष सिंह पुनियां
(ये कविता सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।)
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