भीषण भूख और अकाल के दिनों में
जब सारा सब्र खा कर ख़त्म कर दिया था मैंने
और अब देह ही थी, देह को जीवित रखने के लिए
मैंने सबसे आख़री में अपना हृदय चबाया
सबसे पहले आँखें खाई
बीच में क्या क्या खाया उसका हिसाब नहीं
धोका खाया
आँसू पिये
गुस्सा थूका
नाख़ून चबाए
और इस तरह मैं पूर्णयता स्वयं के लिए स्वयं पर आश्रित था
अपने पैरों पर खड़ा था
मेरे हाँथों में उतरे थे जगन्नाथ
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