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उमैर नज्मी के चुनिंदा शेर

umair najmi selected shayari
                
                                                         
                            मुझे पहले पहल लगता था ज़ाती मसअला है
                                                                 
                            
मैं फिर समझा मोहब्बत कायनाती मसअला है 


एक तारीख़-ए-मुकर्रर पे तू हर माह मिले 
जैसे दफ़्तर में किसी शख़्स को तनख़्वाह मिले 

मिलते हैं मुश्किलों से यहां हम-ख़याल लोग
तेरे तमाम चाहने वालों की ख़ैर हो

कमरे में सिगरेटों का धुआं और तेरी महक
जैसे शदीद धुंध में बाग़ों की सैर हो
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5 वर्ष पहले

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