मुझे पहले पहल लगता था ज़ाती मसअला है
मैं फिर समझा मोहब्बत कायनाती मसअला है
एक तारीख़-ए-मुकर्रर पे तू हर माह मिले
जैसे दफ़्तर में किसी शख़्स को तनख़्वाह मिले
मिलते हैं मुश्किलों से यहां हम-ख़याल लोग
तेरे तमाम चाहने वालों की ख़ैर हो
कमरे में सिगरेटों का धुआं और तेरी महक
जैसे शदीद धुंध में बाग़ों की सैर हो
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