मुझे पहले पहल लगता था ज़ाती मसअला है
मैं फिर समझा मोहब्बत कायनाती मसअला है
एक तारीख़-ए-मुकर्रर पे तू हर माह मिले
जैसे दफ़्तर में किसी शख़्स को तनख़्वाह मिले
आगे पढ़ें
कमेंट
कमेंट X