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Urdu Poetry: तहज़ीब हाफ़ी की ग़ज़ल 'बिछड़ के तुझ से न ख़ुश रह सकूँगा सोचा था'

tahzeeb hafi famous urdu poetry ye ek baat samajhne mein raat ho gayi hai
                
                                                         
                            

ये एक बात समझने में रात हो गई है
मैं उस से जीत गया हूँ कि मात हो गई है

मैं अब के साल परिंदों का दिन मनाऊँगा
मिरी क़रीब के जंगल से बात हो गई है

बिछड़ के तुझ से न ख़ुश रह सकूँगा सोचा था
तिरी जुदाई ही वज्ह-ए-नशात हो गई है

बदन में एक तरफ़ दिन तुलूअ' मैं ने किया
बदन के दूसरे हिस्से में रात हो गई है

मैं जंगलों की तरफ़ चल पड़ा हूँ छोड़ के घर
ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है

रहेगा याद मदीने से वापसी का सफ़र
मैं नज़्म लिखने लगा था कि ना'त हो गई है 

2 वर्ष पहले

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