आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सोनरूपा विशाल की ग़ज़ल: फूल सब के लिए महकते हैं

उर्दू अदब
                
                                                         
                            फूल सब के लिए महकते हैं
                                                                 
                            
लोग लेकिन कहाँ समझते हैं

ज़िंदगी जी रहे हैं हम लेकिन
ज़िंदगी के लिए तरसते हैं

वक़्त का एक नाम और भी है
लोग मरहम भी इस को कहते हैं

रोज़ मिलते नहीं हैं हम ख़ुद से
रोज़ ख़ुद से मगर बिछड़ते हैं

फूल जैसे जो खिल नहीं पाते
फूल जैसे वही बिखरते हैं

वक़्त में ख़ासियत है क्या ऐसी
वक़्त के साथ सब बदलते हैं

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।


लिंक पर क्लिक करें और जुड़ें अमर उजाला काव्य के व्हाट्सएप चैनल से 

https://whatsapp.com/channel/0029VaXoA27A89Mp96alfc2o 



 
4 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर