देखने वाले मिरी ख़ामोशी-ए-लब को न देख
आँखों आँखों में फ़साना कह दिया करता हूँ मैं
ग़म है कि एक तल्ख़ हक़ीक़त है आज-कल
दिल है कि सोगवार-ए-मोहब्बत है आज-कल
हाए इस मजबूरी-ए-ज़ौक़-ए-नज़र को क्या करूँ
वो मुझे देखें न देखें मैं उन्हें देखा करूँ
दिल नज़र बन जाएगा ग़म हर ख़ुशी हो जाएगी
आप के जाते ही दुनिया दूसरी हो जाएगी
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