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सौरभ शर्मा सदफ़ की ग़ज़ल: मैं टूट जाऊँ तो आ कर गले लगा लेना

उर्दू अदब
                
                                                         
                            ये कब कहा था मुझे हम-नवा नहीं देना
                                                                 
                            
मगर हाँ फिर से वही बेवफ़ा नहीं देना

मैं टूट जाऊँ तो आ कर गले लगा लेना
कोई दलील कोई मशवरा नहीं देना

ख़ुदा के नाम पे आपस में बाँटने वालो
ख़ुदा के वास्ते ये वास्ता नहीं देना

बनाने वाले से इतनी मुराद जाएज़ है
बस अब के और कोई हादिसा नहीं देना

ये ख़त नहीं ये मिरे प्यार की अलामत है
सो इस को तैश में आ कर जला नहीं देना

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10 घंटे पहले

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