ग़ज़ल में कैसे ढालूं तुझको क़ातिल, सोचता हूं मैं,
तुझे महसूसना आसां है, मुश्किल सोचता हूं मैं ।
अगर मैं चाहूं भी, तो भी नहीं मिल पाएंगे हम-तुम,
भंवर मंझधार का तू है कि साहिल सोचता हूं मैं ।
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