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Parveen Shakir Ghazal: ख़ुशी की बात है या दुख का मंज़र देख सकती हूँ

parveen shakir urdu poetry khushi ki baat hai ya dukh ka manzar dekh sakti hoon
                
                                                         
                            

ख़ुशी की बात है या दुख का मंज़र देख सकती हूँ
तिरी आवाज़ का चेहरा मैं छू कर देख सकती हूँ

अभी तेरे लबों पे ज़िक्र-ए-फ़स्ल-ए-गुल नहीं आया
मगर इक फूल खिलते अपने अंदर देख सकती हूँ

मुझे तेरी मोहब्बत ने अजब इक रौशनी बख़्शी
मैं इस दुनिया को अब पहले से बेहतर देख सकती हूँ

किनारा ढूँढ़ने की चाह तक मुझ में नहीं होगी
मैं अपने घर में इक ऐसा समुंदर देख सकती हूँ

विसाल-ओ-हिज्र अब यकसाँ हैं वो मंज़िल है चाहत में
मैं आँखें बंद कर के तुझ को अक्सर देख सकती हूँ

अभी तेरे सिवा दुनिया भी है मौजूद इस दिल में
मैं ख़ुद को किस तरह तेरे बराबर देख सकती हूँ 

2 वर्ष पहले

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