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परवीन शाकिर: बजा कि आँख में नींदों के सिलसिले भी नहीं

parveen shakir famous ghazal baja ki aankh mein neendon ke silsile bhi nahin
                
                                                         
                            


बजा कि आँख में नींदों के सिलसिले भी नहीं
शिकस्त-ए-ख़्वाब के अब मुझ में हौसले भी नहीं

नहीं नहीं ये ख़बर दुश्मनों ने दी होगी
वो आए आ के चले भी गए मिले भी नहीं

ये कौन लोग अँधेरों की बात करते हैं
अभी तो चाँद तिरी याद के ढले भी नहीं

अभी से मेरे रफ़ूगर के हाथ थकने लगे
अभी तो चाक मिरे ज़ख़्म के सिले भी नहीं

ख़फ़ा अगरचे हमेशा हुए मगर अब के

एक वर्ष पहले

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