ताक़त से रुकेगी न हिमाकत से रुकेगी
है भीड़ अराजक न सियासत से रुकेगी
फौजें न उतारो अभी मौजों से न खेलो
यह लहर किसी भी न मुरव्वत से रुकेगी
जिसने भी इसे मूर्ख समझने की भूल की
उसको पता है अब न ये तोहमत से रुकेगी
सड़कों पे देखता हूँ जहालत की इंतिहा
ये अब न किसी तौर ख़िलाफ़त से रुकेगी
मारो इसे काटो इसे सूली पे टांग दो
यह नस्ल है जिद्दी न शहादत से रुकेगी
बेशक़ तुम इसके पांव में ज़ंजीर डाल दो
पर ये न किसी तौर हिरासत से रुकेगी
बूटों की ये आवाज़ अब कम होनी चाहिए
अपने हितों की ही ये हिफाज़त से रुकेगी
~ ओम निश्चल
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