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Urdu Poetry: ताक़त  से रुकेगी  न हिमाकत से रुकेगी

कविता
                
                                                         
                            ताक़त  से रुकेगी  न हिमाकत से रुकेगी 
                                                                 
                            
है  भीड़  अराजक न सियासत से रुकेगी 

फौजें  न  उतारो  अभी मौजों से न खेलो 
यह लहर किसी भी न मुरव्वत  से रुकेगी 

जिसने भी इसे  मूर्ख समझने की भूल की 
उसको पता है अब न ये तोहमत से रुकेगी 

सड़कों पे  देखता  हूँ जहालत की  इंतिहा 
ये अब न किसी तौर ख़िलाफ़त  से रुकेगी
 
मारो   इसे   काटो   इसे  सूली पे  टांग दो 
यह  नस्ल  है  जिद्दी  न शहादत से रुकेगी 

बेशक़  तुम  इसके  पांव में  ज़ंजीर डाल दो 
पर  ये न  किसी  तौर  हिरासत  से  रुकेगी

बूटों की ये  आवाज़ अब  कम होनी चाहिए 
अपने  हितों  की ही ये हिफाज़त से रुकेगी 

~ ओम निश्चल 

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3 महीने पहले

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