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नज़्म सुभाष: बाप मरा तो दुनिया बदली, भोला बचपन सूख गया

उर्दू अदब
                
                                                         
                            बोझिल अहसासों के आगे, गहरा चुम्बन सूख गया
                                                                 
                            
मुरझाई मुस्कान दिखी तो, प्यारा दर्पण सूख गया

नाजुक कंधे बोझ उठायें , धोयें ढाबे पर बर्तन
बाप मरा तो दुनिया बदली, भोला बचपन सूख गया

नैहर छूटा, सखियां बिछड़ीं, इक कमरे की दुनिया अब
पीली देह, धंसी हैं आंखें , गद्दर यौवन सूख गया

इन्सानों के घर में जब से , नागफनी के पांव पड़े
सहमा-सहमा तुलसी पौधा, सारा गुलशन सूख गया

कागज के टुकड़ों की खातिर, बीवी- बच्चे भूले थे
देह थकी तो मुड़कर देखा, सारा जीवन सूख गया

दर्द भरी वो लम्बी रातें ,अंधियारे की परछाई
तू-तू, मैं-मैं मार - कुटाई ,भाव समर्पण सूख गया

नीम कटी तो क्षुब्ध परिंदे , खामोशी को छोड़ गये
झिंगली खटिया,तन्हा अम्मा, घर का आंगन सूख गया

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5 घंटे पहले

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