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Urdu Poetry: मैं किसी और के होंटों से पुकारा जाऊँ

उर्दू अदब
                
                                                         
                            तुझ को पा लूँ या तिरे नाम पे वारा जाऊँ
                                                                 
                            
जंग में हार से बेहतर है कि मारा जाऊँ

ये भी इक ज़ुल्म है मुझ पर कि तिरे होते हुए
मैं किसी और के होंटों से पुकारा जाऊँ

हर दरीचे को नहीं मिलती शु'आ'-ए-महताब
मैं भी क्यूँकर तिरी आँखों से निहारा जाऊँ

कैसे दिखते हैं यहाँ 'इश्क़ में मरने वाले
देखना जब कभी सूली से उतारा जाऊँ

बा'द मरने के जनाज़े से सदा आएगी
पहले महबूब की गलियों से गुज़ारा जाऊँ

~ मुसारिफ़ हुसैन मंसूरी

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1 सप्ताह पहले

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