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मुबारक अज़ीमाबादी: चुनिंदा शेर

मुबारक अज़ीमाबादी: चुनिंदा शेर
                
                                                         
                            मुझ को मालूम है अंजाम-ए-मोहब्बत क्या है 
                                                                 
                            
एक दिन मौत की उम्मीद पे जीना होगा 

तेरी बख़्शिश के भरोसे पे ख़ताएँ की हैं 
तेरी रहमत के सहारे ने गुनहगार किया 

तिरी अदा की क़सम है तिरी अदा के सिवा 
पसंद और किसी की हमें अदा न हुई 

अपनी सी करो तुम भी अपनी सी करें हम भी 
कुछ तुम ने भी ठानी है कुछ हम ने भी ठानी है 
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4 वर्ष पहले

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